धार्मिकता या श्रम का अपमान

आज शनिवार है और उन्होंने सुबह सुबह उनके दरवाजे पर आए ‘शनि महाराज’ अर्थात् शनि का दान लेने वाले हृष्ट-पुष्ट व्यक्ति को कटोरी भर तेल और कुछ सिक्कों का दान किया। यह काम वे हर शनिवार को नियम से करते हैं, कभी भूलते नहीं। आज भी ऑफ़िस के लिए निकलते समय ‘कालू’ के लिए घी की रोटी ज़रूर साथ में रखी। कालू नुक्कड़ पर मिलने वाला काला कुत्ता है। ज्योतिषी महाराज ने कहा था कि हर शनिवार को काली वस्तुओं का दान करें और काले कुत्ते को घी रोटी खिलाएँ तो उन पर छाई शनि की महादशा का समय बिना किसी कष्ट के निकल जाएगा। ऑफ़िस के रास्ते में पड़ने वाले शनि मंदिर पहुँच कर वहाँ भी बाहर लगी दुकान से तेल-फूल आदि पूजन सामग्री खरीदी और मंदिर में पहुँचे। बड़े भक्तिभाव से पूजन-अर्चन किया। कुछ मंत्र भी पढ़े जो उनके ज्योतिषी महोदय ने सिखाए थे। अब वे मंदिर के बाहर पंक्तिबद्ध बैठे भिखारियों को श्रद्धापूर्वक एक-दो रूपये देते जा रहे थे। अधिकतर भिखारी सक्षम थे और अपनी रोजी कमा सकते थे। दूर खड़ा नौ-दस साल का बालक उन्हें देख रहा था। उसे लगा ये साहब बड़े ही दयालु हैं। उसके मन में भी कुछ उम्मीदें जागीं। वह उनके पास गया और बोला, ” सा’ब पालिस…एकदम चमका दूँगा”, हाँ वह बालक जूते पॉलिश करके मेहनत से अपना पेट भरता था। उसकी आवाज़ सुनकर साहब की त्यौरियाँ चढ़ गईं। वे गुस्से से चिल्लाए, ”चल भाग यहाँ से… पता नहीं कहाँ से चले आते हैं सुबह सुबह… सारा मूड ख़राब कर दिया…”। बालक सहम गया और हैरानी से उन्हें देखता रहा जब तक कि वे आखों से ओझल न हो गए।

2 Responses

  1. वास्तव मे धार्मिकता का चोंगा होता है, धर्म का तो नामोनिशान भी नहीं होता।

    बहुत सुन्दर और प्रेरणाप्रद लेख है :)

    शुक्रिया
    गरिमा

  2. सत्य ही तो है अतुलजी,
    मानव को धर्म और नक्षत्रों की दशा से तो भय लगता है, परंतु इस बीच वह कभी-कभी श्रम और योग्यता का सम्मान करना भूल जाता है और उसका भला (सम्मान) कहीं भी नहीं होता।
    मियाँ हियाँ तो वइच बात हुइ हे ‍के,
    इधर चला मैं उधर चला,
    जाने कहाँ मैं किधर चला!!!

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