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	<title>Comments on: जरा सोचिए, क्या मिल जाएगा हमें</title>
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	<description>सर्वे भवन्तु सुखिन: सर्वे सन्तु निरामया:। सर्वे भद्राणि पश्यन्तु मा कश्चिद् दु:ख भाग्भवेत्।।</description>
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		<title>By: सारथी-अवलोकन: (चिट्ठों के परिवार का) 1 : सारथी</title>
		<link>http://malwa.wordpress.com/2007/05/19/eventually-what-we-will-get/#comment-195</link>
		<dc:creator>सारथी-अवलोकन: (चिट्ठों के परिवार का) 1 : सारथी</dc:creator>
		<pubDate>Wed, 13 Jun 2007 07:32:19 +0000</pubDate>
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		<description>[...] अतुल शर्मा: अकेला चना (या बहुत सारे) क्या कुछ कर सकेगा [...]</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>[...] अतुल शर्मा: अकेला चना (या बहुत सारे) क्या कुछ कर सकेगा [...]</p>
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		<title>By: अतुल शर्मा</title>
		<link>http://malwa.wordpress.com/2007/05/19/eventually-what-we-will-get/#comment-164</link>
		<dc:creator>अतुल शर्मा</dc:creator>
		<pubDate>Fri, 01 Jun 2007 05:29:40 +0000</pubDate>
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		<description>@Gyandutt Pandey
ज्ञानदत्तजी, टिप्पणियों का क्या है, मुझे खुशी है कि आप मालवा को याद करते हैं।</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>@Gyandutt Pandey<br />
ज्ञानदत्तजी, टिप्पणियों का क्या है, मुझे खुशी है कि आप मालवा को याद करते हैं।</p>
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		<title>By: Gyandutt Pandey</title>
		<link>http://malwa.wordpress.com/2007/05/19/eventually-what-we-will-get/#comment-163</link>
		<dc:creator>Gyandutt Pandey</dc:creator>
		<pubDate>Fri, 01 Jun 2007 05:26:25 +0000</pubDate>
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		<description>अरे मुझे तो लगता था कि मैं इसपर टिप्पणी कर चुका हूं. कई बार चूक हो जाती है. 
खैर, मालवा की बहुत याद आती है. उस बहाने आपकी भी.</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>अरे मुझे तो लगता था कि मैं इसपर टिप्पणी कर चुका हूं. कई बार चूक हो जाती है.<br />
खैर, मालवा की बहुत याद आती है. उस बहाने आपकी भी.</p>
]]></content:encoded>
	</item>
	<item>
		<title>By: अतुल शर्मा</title>
		<link>http://malwa.wordpress.com/2007/05/19/eventually-what-we-will-get/#comment-162</link>
		<dc:creator>अतुल शर्मा</dc:creator>
		<pubDate>Wed, 30 May 2007 08:32:29 +0000</pubDate>
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		<description>@bhaskar 
भास्करजी यहाँ सब कुछ है इनमें से अपनी रुचि के ब्लॉग पढ़ना बेहतर होता है जो पसंद नहीं है उसे देख कर आगे बढ़ जाना चाहिए। मैं भी यही प्रयास कर रहा हूँ।
@Ashok Sharma
अशोकजी अब आए सही पते पर आए हैं। पहले आप जहाँ गए थे वह घर तो अस्थाई रूप से बना रखा है।</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>@bhaskar<br />
भास्करजी यहाँ सब कुछ है इनमें से अपनी रुचि के ब्लॉग पढ़ना बेहतर होता है जो पसंद नहीं है उसे देख कर आगे बढ़ जाना चाहिए। मैं भी यही प्रयास कर रहा हूँ।<br />
@Ashok Sharma<br />
अशोकजी अब आए सही पते पर आए हैं। पहले आप जहाँ गए थे वह घर तो अस्थाई रूप से बना रखा है।</p>
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	</item>
	<item>
		<title>By: Ashok Sharma</title>
		<link>http://malwa.wordpress.com/2007/05/19/eventually-what-we-will-get/#comment-161</link>
		<dc:creator>Ashok Sharma</dc:creator>
		<pubDate>Wed, 30 May 2007 04:47:04 +0000</pubDate>
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		<description>अतुल जी , धन्यवाद् आपका। मैंने आपका ब्लोग पढा और पड़कर बहुत अच्छा लगा.</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>अतुल जी , धन्यवाद् आपका। मैंने आपका ब्लोग पढा और पड़कर बहुत अच्छा लगा.</p>
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	<item>
		<title>By: bhaskar</title>
		<link>http://malwa.wordpress.com/2007/05/19/eventually-what-we-will-get/#comment-160</link>
		<dc:creator>bhaskar</dc:creator>
		<pubDate>Sat, 26 May 2007 13:04:41 +0000</pubDate>
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		<description>अतुल जी - अपन इस मामले में नवजात हैं कि कुछ दिन पहले सक्रिय (भगवान नज़र न लगे किसी की) ब्लॉग लेखन शुरू किया और फ़िर कुछ दिन बाद ही पता चला कि यहाँ भी हिन्दी साहित्य की तरह सर्वगुण सम्पन्न है/ कोई कमी नहीं सच्ची मेरी बुद्धि तो चकित रह गई जब मैने कुछ जूतमपैजार वाले लेख पढ़े/ वे लेख मेरे लिए आदर के पात्र हैं श्लाघ्य हैं वन्दनीय हैं क्योंकि इतनी बढ़िया भाषा, इतने जबर्दस्त उपमाऎं इतने अलंकार, इतनी व्क्रोक्तियाँ, इतनी अन्योक्तियाँ तो बाणभट्ट और कालिदास महाराज ने भी नहीं सोच पाई होंगीं/ खैर बुद्धिजीवियों का ये चिरन्तन झगड़ा है &quot;पंचों का हुकुम सरमाथे पर नाला यहीं से बहेगा&quot; सिद्धान्ततः सब हाँ हाँ क्रियातः सब धाँ-धाँ. खैर क्या करें अपनी जमात ही ऐसी है/ गिरिजाप्रसाद माथुर साह्ब एक कविता शायद हम जैसों के लिए ही लिख गए हैं &quot;आदमी का अनुपात&quot;</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>अतुल जी &#8211; अपन इस मामले में नवजात हैं कि कुछ दिन पहले सक्रिय (भगवान नज़र न लगे किसी की) ब्लॉग लेखन शुरू किया और फ़िर कुछ दिन बाद ही पता चला कि यहाँ भी हिन्दी साहित्य की तरह सर्वगुण सम्पन्न है/ कोई कमी नहीं सच्ची मेरी बुद्धि तो चकित रह गई जब मैने कुछ जूतमपैजार वाले लेख पढ़े/ वे लेख मेरे लिए आदर के पात्र हैं श्लाघ्य हैं वन्दनीय हैं क्योंकि इतनी बढ़िया भाषा, इतने जबर्दस्त उपमाऎं इतने अलंकार, इतनी व्क्रोक्तियाँ, इतनी अन्योक्तियाँ तो बाणभट्ट और कालिदास महाराज ने भी नहीं सोच पाई होंगीं/ खैर बुद्धिजीवियों का ये चिरन्तन झगड़ा है &#8220;पंचों का हुकुम सरमाथे पर नाला यहीं से बहेगा&#8221; सिद्धान्ततः सब हाँ हाँ क्रियातः सब धाँ-धाँ. खैर क्या करें अपनी जमात ही ऐसी है/ गिरिजाप्रसाद माथुर साह्ब एक कविता शायद हम जैसों के लिए ही लिख गए हैं &#8220;आदमी का अनुपात&#8221;</p>
]]></content:encoded>
	</item>
	<item>
		<title>By: सारथी-अवलोकन: (चिट्ठों के विशाल-परिवार का) 1 : सारथी</title>
		<link>http://malwa.wordpress.com/2007/05/19/eventually-what-we-will-get/#comment-159</link>
		<dc:creator>सारथी-अवलोकन: (चिट्ठों के विशाल-परिवार का) 1 : सारथी</dc:creator>
		<pubDate>Sat, 26 May 2007 11:35:30 +0000</pubDate>
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		<description>[...] अतुल शर्मा: अकेला चना (या बहुत सारे) क्या कुछ कर सकेगा [...]</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>[...] अतुल शर्मा: अकेला चना (या बहुत सारे) क्या कुछ कर सकेगा [...]</p>
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	<item>
		<title>By: अतुल शर्मा</title>
		<link>http://malwa.wordpress.com/2007/05/19/eventually-what-we-will-get/#comment-156</link>
		<dc:creator>अतुल शर्मा</dc:creator>
		<pubDate>Mon, 21 May 2007 05:23:50 +0000</pubDate>
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		<description>@dhurvirodhi
बंधु, बुरा देख-देख कर दु:ख हुआ था इसलिए यह सब भावावेश में लिख बैठे। चलिए अब बुरे को धत कहते हैं।
ऐसी फाँसें चुभतीं रही तो व्यंग्य भी बनेगा।

@kakesh
काकेशजी, उल्टी गंगा नहीं बहने देंगे। तटस्थ नहीं रहेंगे परंतु केवल अपने और अपने मित्रों के ब्लॉग पर,  अन्यत्र स्थानों की क्या कहें। 

@संजय बेंगाणी 
संजयजी, आप मेरे विचारों से भली-भाँति अवगत हैं उपाय यही है कि कीचड़ के पास से भी न गुजरें। आप रास्ते से पैदल गुजर रहे हैं और कोई बाईक वाला कीचड़ उछाल कर भाग जाता है तो आप क्या करेंगे सिवा इसके कि घर आकर कपड़े और स्वयं को साफ कर लें।

@श्रीश शर्मा
श्रीश भैया आप सबसे बेहतर काम करते हैं। हमें आपका ही अनुसरण करना चाहिए।

@arun
अरुणजी, आपसे भी वही कहूँगा जो संजयजी को कहा है इस कीचड़ को हम चंद लोग ही देख पा रहे हैं। आप ही सोचिए आपके मेरे शहर के कितने लोग जानते हैं कि हम इंटरनेट पर क्या करते हैं और यहाँ कैसी विचारधारा या भाषा चल रही है। इन सबसे आम जनता के जीवन पर कोई प्रभाव नहीं पड़ेगा तो फिर मैंने भी सोच लिया कि कोई कुछ भी लिखता रहे जनता की सोच और भावनाओं को इंटरनेट के चंद शब्दों से कुछ नहीं होना है।

@सृजनशिल्पी
आप पधारे हैं अर्थात् आप नज़र रखते हैं सब पर। सृजनशिल्पीजी, धन्यवाद के साथ मैं कहूँगा कि मेरे आत्मावलोकन के कारण ही ये भाव प्रकट हुए अन्यथा सब कुछ सुचारु रूप से चल ही रहा है। ये कैसी धर्मनिरेपेक्षता है जो केवल गुजरात को ही देखती है। क्या मेरे या उनके गृहराज्य में सारी समस्याएँ हल हो चुकी हैं और उन्हें अब कोई काम नहीं बचा है। मुझे दु:ख इस बात का है कि मेरा प्रदेश और दूसरे हिन्दी भाषी प्रदेश गुजरात से बहुत पिछड़े हैं और ये लोग इन राज्यों की समस्याओं पर कोई बात ही नहीं करते जहाँ अधिक ज़रूरत है। मध्यप्रदेश, उत्तरप्रदेश, बिहार, झारखंड, उड़ीसा आदि राज्य गुजरात से कई वर्ष पीछे हैं और राष्ट्रीय विकास दर के औसत से भी पीछे हैं, इन प्रदेशों की भी थोड़ी सुध ले ली जाए बेहतर होगा।</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>@dhurvirodhi<br />
बंधु, बुरा देख-देख कर दु:ख हुआ था इसलिए यह सब भावावेश में लिख बैठे। चलिए अब बुरे को धत कहते हैं।<br />
ऐसी फाँसें चुभतीं रही तो व्यंग्य भी बनेगा।</p>
<p>@kakesh<br />
काकेशजी, उल्टी गंगा नहीं बहने देंगे। तटस्थ नहीं रहेंगे परंतु केवल अपने और अपने मित्रों के ब्लॉग पर,  अन्यत्र स्थानों की क्या कहें। </p>
<p>@संजय बेंगाणी<br />
संजयजी, आप मेरे विचारों से भली-भाँति अवगत हैं उपाय यही है कि कीचड़ के पास से भी न गुजरें। आप रास्ते से पैदल गुजर रहे हैं और कोई बाईक वाला कीचड़ उछाल कर भाग जाता है तो आप क्या करेंगे सिवा इसके कि घर आकर कपड़े और स्वयं को साफ कर लें।</p>
<p>@श्रीश शर्मा<br />
श्रीश भैया आप सबसे बेहतर काम करते हैं। हमें आपका ही अनुसरण करना चाहिए।</p>
<p>@arun<br />
अरुणजी, आपसे भी वही कहूँगा जो संजयजी को कहा है इस कीचड़ को हम चंद लोग ही देख पा रहे हैं। आप ही सोचिए आपके मेरे शहर के कितने लोग जानते हैं कि हम इंटरनेट पर क्या करते हैं और यहाँ कैसी विचारधारा या भाषा चल रही है। इन सबसे आम जनता के जीवन पर कोई प्रभाव नहीं पड़ेगा तो फिर मैंने भी सोच लिया कि कोई कुछ भी लिखता रहे जनता की सोच और भावनाओं को इंटरनेट के चंद शब्दों से कुछ नहीं होना है।</p>
<p>@सृजनशिल्पी<br />
आप पधारे हैं अर्थात् आप नज़र रखते हैं सब पर। सृजनशिल्पीजी, धन्यवाद के साथ मैं कहूँगा कि मेरे आत्मावलोकन के कारण ही ये भाव प्रकट हुए अन्यथा सब कुछ सुचारु रूप से चल ही रहा है। ये कैसी धर्मनिरेपेक्षता है जो केवल गुजरात को ही देखती है। क्या मेरे या उनके गृहराज्य में सारी समस्याएँ हल हो चुकी हैं और उन्हें अब कोई काम नहीं बचा है। मुझे दु:ख इस बात का है कि मेरा प्रदेश और दूसरे हिन्दी भाषी प्रदेश गुजरात से बहुत पिछड़े हैं और ये लोग इन राज्यों की समस्याओं पर कोई बात ही नहीं करते जहाँ अधिक ज़रूरत है। मध्यप्रदेश, उत्तरप्रदेश, बिहार, झारखंड, उड़ीसा आदि राज्य गुजरात से कई वर्ष पीछे हैं और राष्ट्रीय विकास दर के औसत से भी पीछे हैं, इन प्रदेशों की भी थोड़ी सुध ले ली जाए बेहतर होगा।</p>
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	</item>
	<item>
		<title>By: सृजन शिल्पी</title>
		<link>http://malwa.wordpress.com/2007/05/19/eventually-what-we-will-get/#comment-153</link>
		<dc:creator>सृजन शिल्पी</dc:creator>
		<pubDate>Sun, 20 May 2007 04:43:35 +0000</pubDate>
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		<description>अतुल जी, आप चिंतनशील हैं, आत्मावलोकन कर सकते हैं, सही-ग़लत, ज़रूरी-गैर-ज़रूरी का फ़र्क कर सकते हैं। लेकिन कुछ लोगों की सोच और नज़रिए पर एक खास वैचारिक पूर्वग्रह का चश्मा चढ़ा रहता है जो उन्हें यह सब करने नहीं देता। हैरानी की बात यह है कि उन्हें अपने कैंप में भी आत्मावलोकन करने वाले लोग पसंद नहीं आते। कट्टर लोग ऐसे ही होते हैं, चाहे वे धर्मनिरपेक्षता के लिए कट्टर हों या सांप्रदायिकता के लिए। यही वज़ह है कि अविनाश को अभय के निर्मल चिंतन से अब आनन्द की नहीं, बल्कि विषाद की प्राप्ति हो रही है!

उससे कभी किसी मुद्दे पर स्वस्थ बहस की उम्मीद नहीं कर सकते। चिट्ठाकारी की तो बात ही छोड़िए, जिस पत्रकारिता को उसके जैसे पत्रकार अपनी रोजी-रोटी मानते हैं, उसमें भी वे अपना धर्म ईमानदारी से निभाने की कोशिश नहीं करते।  वहां इनका ज़मीर जनसरोकारों के विपरीत काम करने के लिए नहीं धिक्कारता, लेकिन ये दूसरों की सोच और ईमानदारी के पहरेदार बनने की जुर्रत करने से नहीं हिचकते।</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>अतुल जी, आप चिंतनशील हैं, आत्मावलोकन कर सकते हैं, सही-ग़लत, ज़रूरी-गैर-ज़रूरी का फ़र्क कर सकते हैं। लेकिन कुछ लोगों की सोच और नज़रिए पर एक खास वैचारिक पूर्वग्रह का चश्मा चढ़ा रहता है जो उन्हें यह सब करने नहीं देता। हैरानी की बात यह है कि उन्हें अपने कैंप में भी आत्मावलोकन करने वाले लोग पसंद नहीं आते। कट्टर लोग ऐसे ही होते हैं, चाहे वे धर्मनिरपेक्षता के लिए कट्टर हों या सांप्रदायिकता के लिए। यही वज़ह है कि अविनाश को अभय के निर्मल चिंतन से अब आनन्द की नहीं, बल्कि विषाद की प्राप्ति हो रही है!</p>
<p>उससे कभी किसी मुद्दे पर स्वस्थ बहस की उम्मीद नहीं कर सकते। चिट्ठाकारी की तो बात ही छोड़िए, जिस पत्रकारिता को उसके जैसे पत्रकार अपनी रोजी-रोटी मानते हैं, उसमें भी वे अपना धर्म ईमानदारी से निभाने की कोशिश नहीं करते।  वहां इनका ज़मीर जनसरोकारों के विपरीत काम करने के लिए नहीं धिक्कारता, लेकिन ये दूसरों की सोच और ईमानदारी के पहरेदार बनने की जुर्रत करने से नहीं हिचकते।</p>
]]></content:encoded>
	</item>
	<item>
		<title>By: arun</title>
		<link>http://malwa.wordpress.com/2007/05/19/eventually-what-we-will-get/#comment-152</link>
		<dc:creator>arun</dc:creator>
		<pubDate>Sat, 19 May 2007 12:22:52 +0000</pubDate>
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		<description>आपका कहना सही है काश ऐसा हो पाता, अतुल जी
पहले मै अपने ब्लोग की शुरुआत इसी से करता था&quot;समर शेष है, नहीं पाप का भागी केवल व्याध, जो तटस्थ हैं, समय लिखेगा उनके भी अपराध।&quot; पर अब अन्त इससे करता हू शुरू इससे &quot;देह शिवा वर मोहे यह, शुभ करमन से कबहु न डरो न डरो अरि सो जब जाय लरौ, निश्चय कर अपनी जीत करो&quot;
लेकिन गलत सुनने को तो न तब तैयार था न अब
लेकिन अब भी यह तो कहूगा ही&quot;भले से वचन है. सर आँखो पर. मगर जबरदस्ती अपनी किचड़ उछाल में चंद लोग शामिल करने की कोशिश करते है तो बुरा तो लगेगा ही ना.&quot;</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>आपका कहना सही है काश ऐसा हो पाता, अतुल जी<br />
पहले मै अपने ब्लोग की शुरुआत इसी से करता था&#8221;समर शेष है, नहीं पाप का भागी केवल व्याध, जो तटस्थ हैं, समय लिखेगा उनके भी अपराध।&#8221; पर अब अन्त इससे करता हू शुरू इससे &#8220;देह शिवा वर मोहे यह, शुभ करमन से कबहु न डरो न डरो अरि सो जब जाय लरौ, निश्चय कर अपनी जीत करो&#8221;<br />
लेकिन गलत सुनने को तो न तब तैयार था न अब<br />
लेकिन अब भी यह तो कहूगा ही&#8221;भले से वचन है. सर आँखो पर. मगर जबरदस्ती अपनी किचड़ उछाल में चंद लोग शामिल करने की कोशिश करते है तो बुरा तो लगेगा ही ना.&#8221;</p>
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