केवल एक दिन महिलाओं के लिए?

Indian Woman

8 मई महिला दिवस है। विकसित कहे जाने वाले देश और समाज जैसे इंग्लैंड या अमेरिका में भी महिलाओं के साथ हिंसक घटनाएँ उनके पति या परिवार वालों के द्वारा ही होती रहतीं हैं। भारत में ‍इसकी जितनी ख़बरें छपतीं या प्रसारित होतीं हैं उससे कहीं अधिक नेपथ्य में रह जातीं हैं। पुराने जमाने में महिलाओं को उसके मृत पति के साथ जिंदा जला दिया जाता था (छुटपुट घटनाएँ आज भी हो जातीं है) तो आज लड़की को मार कर तंदूर में जला दिया जाता है और उसके अपराधी को सजा तक नहीं होती (अभी अभी हुई है)। बार में लड़की ने शराब देने से इंकार कर दिया तो गोली मार दी। तेरह वर्षीय अमीना को सत्तर साल के शेख के साथ बाँध दिया। कुछ सौ रुपयों में कमला को खरीदा जा सकता है। नशे की झोंक में तलाक दे दिया। पति लापता हो गया तो गुड़िया की शादी किसी और से कर दी (उससे पूछा भी नहीं होगा), जब पहला पति लौट आया तो समाज के ठेकेदार तय करने लगे कि अब गुड़िया किसके साथ रहेगी। गुड़िया क्यों नहीं फैसला कर सकती कि उसे किसके साथ रहना है। गुड़िया सवाल क्यों नहीं कर सकती कि उसकी शादी किसी से भी क्यों की जा रही है। ससुर ने बहू के साथ बलात्कार किया तो फतवा जारी हो गया कि महिला अब उसके पति के लिए हराम है। इन घटनाओं पर मीडिया ने मेहबानी दिखाई (अपनी टीआरपी बढ़ाने के लिए) और ये सामने आईं। देवदासी प्रथा बहुत कम हो गई है परंतु पूरी समाप्त नहीं हुई है। कुछ विशेष समाजों में परिवार की बड़ी लड़की को वेश्यावृत्ति करनी होती है और यह उनके समाज में मान्य भी है। कुछ समाजों में स्त्री को स्वयं को सच्चरित्र सिद्ध करने के लिए अग्नि परीक्षा देनी होती है। इसके लिए उबलते तेल में हाथ डालना होता है या हथेली पर पान का पत्ता रख कर उस पर लाल तपी हुई लोहे की सलाख रखनी होती है, यदि इस प्रक्रिया में स्त्री को कोई नुकसान नहीं होता तो उसे पवित्र मान लिया जाता है। अब कल्पना करें क्या ऐसा होता होगा? यह तो उनके जीवन में होने वाली घटनाएँ हैं, कई लोग तो लड़कियों को जन्म लेने से पहले ही मार देते हैं। क़ानून होने के बाद भी कई चिकित्सक भ्रूण लिंग परीक्षण करते हैं और घोषित करने की मोटी रकम लेते हैं। विषय और घटनाक्रम अनेक हैं जो लिखे जा सकते हैं।
हर साल की तरह इस बार भी समारोह होंगें, घोषणाएँ होंगीं, परिचर्चाएँ होंगीं और भाग लेने वाली महिलाएँ (पुरुष भी हो सकते हैं) होंगीं कोई नेता, फ़िल्म स्टार, किसी बड़े उद्योगपति या अधिकारी की पत्नी। लगभग इन सभी महिलाओं ने बचपन से लेकर वर्तमान समय तक शायद ही कभी ग्रामीण या निम्न वर्ग (आर्थिक रूप से, यहाँ जाति या समाज का संदर्भ न लें) की महिलाओं के जीवन को निकट से देखा होगा। गाँवों में स्त्रियाँ सुबह अँधेरे से उठ कर घर के सारे काम करके खेतों में भी पति के साथ मेहनत करती हैं और शाम को घर आकर फिर भोजन आदि घर के कार्यों में जुट जाती है। क्या केवल गाँवों में ही ऐसी स्थिति है, बिलकुल नहीं यह स्थिति किसी शहरी नौकरीपेशा मध्यमवर्गीय परिवार में भी मिल सकती है और श्रमिक वर्ग में भी। घरेलू हिंसा पर क़ानून बन गया पर भारतीय समाज का ताना बाना कुछ ऐसा है कि शायद कुछ ही महिलाएँ परिवार के सदस्यों के विरुद्ध क़ानून की मदद ले। भारत की वह तस्वीर बहुत भली मालूम होती है जिसमें कोई महिला वकील है, कोई डॉक्टर है, कोई पायलट है, कोई सेना में है, पुलिस में है, सॉफ़्टवेयर इंजीनियर है, ये है, वो है, सब कुछ है, हर क्षे‍त्र में है। परंतु इसका अनुपात उतना ही है जैसे किसी समुद्र में तैरते हिमखंड का पानी के ऊपर का भाग। उसका जो नब्बे प्रतिशत भाग पानी में रहता और नज़र नहीं आता, कमोबेश वही स्थिति इस चमकीले परिदृश्य से परे महिलाओं की है। अधिसंख्य लड़कियाँ विद्यालय का मुँह भी नहीं देख पाती। बहुतों को प्राथमिक और माध्यमिक के बाद विद्यालय छोड़ना पड़ता है, इनमें से अधिकांश का विवाह हो जाता है। इस समय इनकी उम्र अठाहर वर्ष से कम ही होती है। अधिकतर परिवारों में माता-पिता मजदूरी पर जाते हैं तो बड़ी लड़की को अपने छोटे भाई बहन को संभालने के लिए घर रहना होता है। ऐसे में स्कूल जाने का सवाल ही नहीं उठता। यदि लड़की भाई बहनों सबसे छोटी है तो शायद दो-चार साल विद्यालय जाए परंतु कुछ बड़ी होने पर वहाँ से निकाल लिया जाता है ताकि वह भी कुछ काम करे और घर की आय बढ़े। इतने बड़े परिवार के लिए सभी का काम करना भी जरूरी है क्योंकि माता-पिता को इतनी मजदूरी नहीं मिलती वे अपना परिवार चला सकें। इन बच्चियों का बचपन में ही विवाह हो जाता है और फिर वही चक्र शुरु हो जाता जिससे उनकी माँ गुजरी है। देश के हर भाग में लगभग हर समाज में ये समस्याएँ है जो आज भी मौजूद हैं हालाँकि इनमें कमी जरूर आई है। अनेक संस्थाएँ इस दिशा में काम कर रहीं हैं। महिलाओं का साक्षरता प्रतिशत पहले से बढ़ा है। एक दिन निश्चित रूप से ऐसी घटनाएँ इतिहास की बातें होंगीं और ये पंक्तियाँ भी-

अबला जीवन हाय तेरी यही कहानी
आँचल में है दूध और आँखों में पानी।

कहानी बदल रही है, बदलेगी।

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2 Responses

  1. अच्छा लेख.

    दुःख की बात है की महिला को कष्ट महिला भी पहूँचाती है. घरेलू हिंसा में स्त्रीयों की भागीदारी भी होती है.

    शिक्षा के प्रसार के साथ स्थिती जरूर बदलेगी.

  2. कोई शब्द नही रह गये… क्या कहूँ, जहाँ पहले मै इन मुद्दो पर बहूत बोलती थी अब मौन रहती हूँ क्योकि ऐसा लगता है कि, अब सिर्फ बोलने से काम नही चलेगा, कुछ करना होगा… और इस दिशा मे प्रयासरत रहती हूँ।
    दर्पण की तरह स्वच्छ लेख की लिए शुक्रिया

    गरिमा

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