चिठ्ठाकारी का एक साल

कल इस चिट्ठे को एक वर्ष पूरा हो गया। समय की कमी के कारण इस पोस्ट कल नहीं लिख सका  इसलिए ‍चिट्ठे के जन्मदिन के दूसरे दिन मैं यह पोस्ट डाल रहा हूँ। ठीक एक साल पहले 6 जून 2006 को पहली पोस्ट लिखी थी और देखते ही देखते एक साल गुजर गया पता ही नहीं चला। जब इस पोस्ट को लिखने के लिए पहली पोस्ट को देखा तो मालूम हुआ कि चिट्ठे की शुरुआत वाले दिन में कुछ खास बात है; तारीख 6, महीना छठा (जून) और इक्कीसवीं सदी का छठा साल (2006)। वैसे देखा जाए तो यह दिन केवल लिखने के प्रयास की शुरुआत का दिन है। चिट्ठों की गलियों में भटकना तो 2006 की आधी फरवरी से ही शुरु कर दिया था। इन्हीं दिनों एक दिन गूगल पर कुछ सर्च करने पर गूगल ने जो सूची दी थी उसमें एक लिंक अतुलजी अरोरा के संस्मरण ब्लॉग लाइफ इन ए एचओवी लेन के लिए थी। वहाँ जाने पर बहुत हैरानी हुई थी। हैरानी इसलिए कि यह सब उनका हिन्दी में व्यक्तिगत लेखन था अर्थात् यह कोई समाचार पत्र, पत्रिका की साइट नहीं थी। उस समय तक इंटरनेट साइट्स के बारे में मेरा ज्ञान इतना ही था ‍कि केवल सरकारी-निजी संस्थान, कंपनियाँ, शिक्षा संस्थान, व्यापारिक संगठन, संस्था आदि ही साइट बना सकते हैं। अपनी निजी साइट बनाना आम आदमी के बूते के बाहर है क्योंकि नेट पर जगह पाना बहुत मँहगा हो सकता है और उससे भी बड़ी बात, साइट का खाका तैयार करने के लिए किसी वेब डिज़ाइनर की सेवा लेना अतिआवश्यक है। इसके अलावा मैं केवल इतना जानता था कि हिन्दी तो केवल कुछ गिने-चुने समाचार पत्रों, पत्रिकाओं की साइट पर देखी जा सकती है, बाकी तो इंटरनेट पर सभी कुछ अंग्रेजी में है। गूगल पर हिन्दी शब्दों की खोज तो केवल उत्सुकतावश की थी। उसी उत्सुकता से अतुलजी का संस्मरण पढ़ना शुरु किया तो पढ़ता ही चला गया, इतनी रोचक, बांधे रखने वाली सरल भाषा में लिखा गया है किसी कोई भी भाग अधूरा छोड़ने का मन ही नहीं करता था। आज भी इसे पढ़ने में वही आनंद आता है जो पहली बार आया था। एक ही कमी है इस पर टिप्पणियाँ बहुत ही कम हैं (मैंने खुद ने ही नहीं डाली अब तक 😦  )। 

यहीं से शुरु होता है अंदर उतरते जाने का सफर। मुझे टिप्पणियों में जो नाम दिखाई दिए उनमें से दो थे जितेन्द्रजी चौधरी और अनूपजी शुक्ला। इनके नामों पर क्लिक करके देखा तो दूसरे दरवाजे खुलना शुरु हुए। मैं हर चिट्ठे की टिप्पणी के माध्यम से अगले चिट्ठे पर जाता था। जिस भी नए चिट्ठे पर जाता उसका URL कॉपी करके रख लेता। इस तरह फ़रवरी के अंतिम सप्ताह से लेकर मई तक मैंने लगभग 150 चिट्ठों की सूची तैयार कर ली थी। जी हाँ, उस समय तक नारद के बारे में ठीक से नहीं जान पाया था। बीच में किसी चिट्ठे पर नारद के बटन को क्लिक किया था और जाकर देखा तो बहुत सारे शीर्षक हैं और उनके नीचे चार चार लाइनों का विवरण है। मैंने सोचा, ‘यह कुछ अजीब चिट्ठा है, सब पोस्ट अधूरी डिस्प्ले होती है।’ बाद में चिट्ठों को पढ़ पढ़ कर समझ में आया कि नारद एक जंक्शन है और हर चिट्ठे की रेल यहीं से होकर गुजरती है। किसी चिट्ठे पर बुनो कहानी का जायजा लिया, तो किसी से होकर सर्वज्ञ पर पहुँचा। इसी तरह अनुगूँज, अक्षरग्राम, निरंतर, चिट्ठाविश्व, ब्लॉगनाद आदि के बारे में जाना। तब भी मैं इन सबको अलग अलग चिट्ठे समझता था। बाद में जाना कि ये सभी नारद के समवेत स्वर () हैं। इसी दौरान इन चिट्ठों को पढ़ते पढ़ते यह जाना कि ये चिट्ठे ब्लॉग कहलाते हैं और ब्लॉग का हिन्दी शब्द चिट्ठा मान्य किया गया है।

इतने चिट्ठों से यह मालूम हुआ कि ब्लॉगर एक सेवा है जो लोगों को निशुल्क चिट्ठा बनाने और होस्टिंग की सुविधा देता है। तो मई माह में मैंने भी ब्लॉगर पर पंजीयन किया और चिट्ठा बनाने बैठे, परंतु जब एक छोटी सी पोस्ट लिख कर पब्लिश करने गए तो 71% पर जाकर गाड़ी अटक गई। दोबारा प्रयास किया तो फिर 71% पर जाकर विराम लग गया। एक बार और कोशिश की परंतु वही ढाक के तीन पात। अब तो हिम्मत जवाब दे गई थी। शायद नेटवर्क की या कोई अन्य समस्या रही होगी अलबत्ता चिट्ठा बनाने का विचार कुछ दिनों के लिए स्थगित कर दिया गया। मैंने सोचा था कि चिट्ठा न बने तो भी कोई बात नहीं पंजीकरण टिप्पणी देने के काम आएगा क्योंकि बहुत से चिट्ठों में टिप्पणी करने के लिए लॉ‍ग इन करना होता है और इसीलिए शुरु में तो यही समझ लिया था कि केवल एक चिट्ठाकार ही दूसरे चिट्ठाकार के चिट्ठे पर टिप्पणी दे सकता है (हाल ही में कुछ दिनों पहले इसी लॉग इन करके टिपियाने की प्रथा के कारण ही ब्लॉगर पर दोबारा पंजीयन किया)। फ़रवरी से मई तक कहीं भी टिप्पणी नहीं की थी। थोड़ा सा भय भी था क्योंकि पुराने लोग बेतकल्लुफ थे और हमें लगता था कि इनके बीच में हम कहाँ कूद पड़ें, बेवजह ‘मान न मान मैं तेरा मेहमान’ ठीक नहीं। तो मैं साक्षी भाव से चिट्ठों को निहारे जा रहा था कि अचानक एक दिन बिल्ली के भाग्य से छींका टूटा। कुछ चिट्ठों की पोस्ट में संदेश देखा कि वे ब्लॉगर से वर्डप्रेस डॉट कॉम के घर पर जा रहे हैं (वो कौन से चिट्ठे थे अब याद भी नहीं है)। अब तक एकत्र किए ज्ञान से इतना समझ में आ गया कि ये ब्लॉगर जैसी कोई दूसरी सेवा है जहाँ चिट्ठे बनाए जा सकते हैं। उन बंधुओं के बताते पते पर जाकर उनके नए चिट्ठों को निहारा, वे कुछ अलग-अलग से लगे, तो मैंने सोचा लगे हाथ वर्डप्रेस पर ही चिट्ठा बना कर देख लिया जाए। यहाँ पर बहुत ही आसानी से चिट्ठा बन गया तो मालव संदेश यहीं पर शुरु हो गया जो आपके सामने हैं। यह चिट्ठा ब्लॉगर और वर्डप्रेस के गुण-अवगुण देख कर नहीं बनाया बल्कि जहाँ आसानी से बन गया वहीं डेरा डाल लिया।

यह तो मेरे चिट्ठे के निर्माण तक की गाथा थी। इसमें मुख्‍य रूप से मैंने चिट्ठों को देखने-पढ़ने और स्वयं का चिट्ठा बनाने की बात की। फ़रवरी से मई तक लगभग तीन माह तक मैंने जो तकरीबन 150 चिट्ठे देखे उनमें से अनेक पर आज भी लेखन जारी है और कई ऐसे भी हैं जो एक अरसे से सोए पड़े हैं। मैं चाहता हूँ कि जो कुछ उस समय मैंने देखा, पढ़ा समझा कुछ उसके बारे में बताऊँ, कुछ उन चिट्ठों और चिट्ठाकारों के बारे में बताऊँ जिन्हें मैंने उस समय पढ़ा और बाद तक पढ़ता आया हूँ। जो एक साल आप लोगों के साथ गुजारा उसके बारे में भी लिखना चाहता हूँ। इस एक वर्ष में चिट्ठा जगत में जो परिवर्तन मैंने अनुभव किए उसे आपके साथ बाँटना चाहता हूँ। इस दौरान बहुत से नए साथी आए उनके बारे में बात करना चाहता हूँ। परंतु अभी इन सब बातों को समेटने के लिए समय कुछ कम लग रहा है क्योंकि सूत्र सारे बिखरे पड़े हैं इसलिए इस पोस्ट को यहीं विराम दे रहा हूँ। शेष बातें इसी पोस्ट की अगली कड़ी में देने का विचार है।

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पुनश्च: अरुण के आग्रह पर भूल सुधार करते हुए जन्मदिन का केक आप सभी के लिए प्रस्तुत कर दिया गया है।

                                 

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जरा सोचिए, क्या मिल जाएगा हमें

धुरविरोधीजी आपने सही लिखा है फिर भी यहाँ चीखने चिल्लाने से न तो मोदी का कुछ होना है, न चन्द्रमोहन का, न एम.एफ़: हुसेन का और ना ही आप जिन्हें समझा रहे हैं उन्हें कुछ असर होना है। गुजरात के नाम से चिल्लाने वाले क्या नहीं जानते हैं कि हिन्दी भाषी राज्यों की क्या हालत है। इन्दौर से कभी पटना, इलाहाबाद दिल्ली जाना होता है तो इन राज्यों की सीमा में जाते ही रेलों पर गुंडों का राज हो जाता है। उसके बारे में कोई नहीं बोलता। रिजर्वेशन हो तो भी रात के समय सोते हुए लोगों को उठा दिया जाता है। महिलाओं से भी बदतमीजी की जाती है। भाई लोगों गुजरात में यह सब नहीं होता फिर भी वहाँ की जनता और प्रशासन को ही कोसा जाता है।
अब इतने लंबे समय के बाद मुझे लगता है हमें क्या मिलेगा इस सबसे। हम चंद लोग नेट पर टीका टिप्पणी करते रहते हैं। मेरे मित्रों में केवल एक है जो इंटरनेट जानता और समझता है क्योंकि वह सॉफ़्टवेयर के क्षेत्र में है परंतु वह भी हिन्दी ब्लॉग के बारे में तब तक नहीं जानता था जब तक कि मैंने उसे नहीं बता दिया। करोड़ों लोग कम्प्यूटर और इंटरनेट के बारे में नहीं जानते, तो हम चंद लोग यहाँ क्या आरोप प्रत्यारोप कर रहे हैं किसी को कुछ नहीं पता। कितना कीमती समय नष्ट किया हम सभी ने अपना सबका। 22 मार्च को विश्व जल दिवस निकल गया किसी ने कोई बात नहीं की सबके सब बेपानी हो गए। एक हिन्दू धर्म और हिन्दू जनता ही सुधारने को बच गई है(?) और तो कोई समस्या है ही नहीं इस ‍देश में। एक गुजरात ही बच गया है देश में सुधारने के लिए बाकी जगह तो प्रेम की गंगा बह रही है।

मातृ दिवस पर सभी ने माँ के लिए पोस्ट लिखी परंतु भाईयो धरती माँ को भी याद कर लेते। यही सोच लेते कि चलो पानी ही बचा लें, धरती का भी और आँखों का भी। परन्तु यहाँ तो लोगों का खून जलाने की बातें होतीं हैं। चिट्ठाजगत का ध्रुवीकरण तो हो ही गया है। मुझे ऐसा लगता है कि बुजुर्गजन चाहते तो समय रहते रोक सकते थे। जब बच्चे लड़ते हैं तो बड़े बुजुर्ग ही उन्हें समझाते हैं। पर यहाँ तो कहा जा रहा है कि हर बच्चे को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता  है।

अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के नाम पर चन्द्रमोहन स्त्री का नग्न चित्र बनाए जिसमें उसे प्रसव होता दिखाए और कहे कि दुर्गा माता है। ज्ञानदत्तजी पाण्डेय के ब्लॉग पर इस खबर की लिंक हैं। एम. एफ़. हुसैन ने जो बनाया उसे तो यहाँ सार्वजनिक रूप से मैं लिख कर भी नहीं बता सकता हूँ। मैंने देखा है तभी कह रहा हूँ। 

ये लोग जिन लोगों ने हिन्दी में चिट्ठे लिखने की शुरुआत की (भले ही वे पाँच सात लोग थे) वे सोचते थे कि इंटरनेट पर वे इंटरनेट पर हिन्दी की सामग्री उतनी ही सरलता से उपलब्ध हो जितनी कि अन्य भाषाओं की मिलती है, ताकि जब लोग हिन्दी में सर्च करें तो उन्हें हिन्दी में भी संबंधित सामग्री पढ़ने को मिले। हिन्दी विकी का भी यही उद्देश्य था। इसके अलावा जनता को चिट्ठों पर भी सामान्य, गंभीर दोनों किस्म का लेखन मिले तो ही हमारा लेखन सार्थक होगा। परंतु जब कोई खोजते हुए यहाँ आएगा तो देखेगा कि यहाँ लोग एक दूसरे की कुत्ताफजीती (हिन्दी का शब्द है कोई अन्यथा न ले) कर रहे हैं तो क्या सोचेगा। आम चलताऊ भाषा से लेकर गंभीर भाषा और गंभीर किस्म के विरोध चल रहे हैं जिनका कोई औचित्य मुझे नज़र नहीं आता।

हम आने आने वाली पीढ़ी को क्या देने वाले हैं। हिन्दी ब्लॉगजगत में भी अच्छे लेखन की खुशबू से ज्यादा बारूद की गंध आती है अब। कई बार लगता है कि अच्छा तो यह है कि नारद मुनि के दर्शन ही नहीं किए जाएँ तो अच्छा है। अपना चिट्ठा लिखो और खुश रहो, फिर उसे कोई पढ़े या ना पढ़े। जिन लोगों की लेखनी अच्‍छी लगती है उनके लिंक अपने चिट्ठे में लगा लिए जाएँ। भला होगा यदि चार पोस्ट या टिप्पणी न लिख कर अपनी कालोनी में चार घरों के सामने चार पेड़ ही लगा लूँ तो अच्छा है। कुछ लोगों को बारिश का पानी सहेजने के लिए मना लूँ तो अच्छा है।

लानत है हम सब पढ़ लिखों पर नहीं मुझ पर-अपनेआप पर, इससे अच्छी मालवा के गाँव (जहाँ रहता हूँ वहीं का लिखूँगा ना) की अपनढ़ सईदा चाची है जो शुद्ध मालवी बोली में कहती हैं, ‘पोर बिलकिस के परणई दी है’ (पिछले वर्ष बिलकिस का विवाह कर दिया है) और तारा काकी जवाब देतीं हैं,’घणो हारु करयो’ (बहुत अच्‍छा किया)। इनकी बोली से इनके सम्प्रदाय का पता नहीं चलता और न ही इस बात पर ये कुछ सोचतीं हैं। यही खासियत है हिन्दुस्तान की। इन दोनों को एक दूसरे से कोई भय नहीं है और सईदा चाची को गुजरात या मोदी से कोई मतलब नहीं है। भला है गाँवों में मोहल्ले नहीं होते।           

बाज़ार की बयार

[इस आलेख को लिखने वाले स्वयं को सीटीवादक कहलाना पसंद करते हैं। यहाँ ये इसी नाम से आलेख देना चाहते हैं। अब सीटीवादक नाम क्यों, ये तो वे स्वयं ही अपने शब्दों में कभी बताएँगे तो मैं और आप भी जानेंगे, परंतु मैंने इस सीटी बजाने का कुछ अंदाज लगाया है। देश के नेता जो देश के साथ कर रहे हैं तो इस पर इनके उद्‍गार होते हैं, इन नेताओं ने देश की सीटी बजा रखी है, या फिर भारतीय टीम के हारने पर, ढंग से सीटी भी नहीं बजा सकते, या फिर बरमुडा को हराने पर, भारतीय टीम ने क्या मस्त सीटी बजाई। कभी कभी कोई काम बिगड़ जाता है तो वे सीटी से किसी और वाद्य पर शिफ़्ट हो जाते हैं और कहते हैं, अरे इसमें तो रणभेरियाँ और ‍तुरहियाँ बजी हुईं हैं, या फिर कहेंगे, बुरी तरह से नगाड़े बजा रखे हैं। कोई काम बहुत अच्छा होने पर कहते हैं, बहुत ही सुर में बजाई हैंजीविका के लिए ये कलम घिसते हैं और कलम के फल अर्थात् समाचार पत्रों से ख़फ़ा नज़र आते हैं। इस आलेख में उन्होंने यही आक्रोश व्यक्त किया है।]  

बाज़ार की बयार

हर व्यक्ति का रोज़ सुबह अख़बार के पन्नों से तो पाला पड़ता ही है। वैसे आजकल पाला तो दिसंबर जनवरी में भी नहीं पड़ता, हाँ गर्मी ज़रूर सुरसा की तरह मुँह फैला रही है। ख़ैर बात समाचारों की कर रहा था। आज सुबह के अख़बार ही शेयरों के औधें मुँह गिरने की मुख्य ख़बर थी। एक नज़र दूसरे पन्नों की ख़बरों पर भी। सिनेमा के विज्ञापन वाले पृष्‍ठ पर मल्लिका शेरावत अपने आधे उरोज़ और अधोवस्त्र की प्रदर्शनी लगाकर अपनी आपको फिल्म देखने के लिए खुला आमंत्रण दे रही हैं कि दम है तो देखो नहीं तो…. पेज ३ पर अधेड़ और जवाँ प्रतिष्ठित हस्तियों (?) के मदहोश, अधनंगे चित्रों की बाढ़-सी लगी हुई है। एक और ख़बर है कि अमेरिका में डेटिंग कि जगह हुक अपने ले ली है। हुक अप एक नया चलन है जो आधुनिक बाज़ार के हिसाब से डिस्पोज़ल जैसा है। यानी यूज़ एंड थ्रो। इसने युवाओं के बीच एक नई कहावत का जन्म दिया है कि मांस खाओं हड्डी गले मत बाँधो। एक जगह वैद्यराज की सलाह वाले कॉलम में नीक हकीम ख़तराए जान की तर्ज पर वैद्यराज जी एक जवान पाठिका की व्यक्तिगत परेशानी का समाधान दे रहे हैं जो कि अपने प्रेमी के शीघ्र पतनसे व्यथित है। वह अपने आपको पतितनहीं मानती और प्रश्न उसके द्वारा पूछे जाने का कारण भी बताती है कि उसके प्रेमी को यह सब पूछने में शर्म आती है। वर्गीकृत विज्ञापन पर नज़र डालें तो हेल्थ वर्ग में अनोखे मसाज़ पार्लर के इश्तहार में मसाज़ से अधिक वर्णन मसाज़ करने वाली/वाले लोगों का ज़िक्र ज़्यादा रहता है। एसे विज्ञापन अख़बारों के पूरे माह या साल भर के विज्ञापन छूट का लाभ अवश्य लेते हैं। आवश्यकता है के कॉलम में सिर्फ़ स्मार्ट लड़के लड़कियाँ ही चाहिए होती हैं। विज्ञापन पढ़कर ऐसा लगता है जैसे उन्हें काम नहीं करना पड़ेगा बल्कि किसी फैशन शो में हिस्सा लेने के लिए आमं‍त्रित किया जा रहा है। एक सर्वे की रिपोर्ट छपती है कि संसार में समलैंगिक पुरुषों की संख्या सामान्य पुरुषों कि तुलना में कहीं ज़्यादा हो गई है। फिल्मी कॉलम में एक हिरोइन का बयान छपता है कि फिल्म इंडस्ट्री में कोई ऐसी लड़की नहीं है जो डायरेक्टर का बिस्तर गरम नहीं करती। कुल मिलाकर समाचार पत्र भी कुछ चैनलों की तरह (बेचारे दूरदर्शन को छोड़कर) अपसंस्कृति ही परोस रहे हैं, हालाँकि इसमें भी अब संक्रमण होने लगा है। आजकल हर बड़े अख़बार ने सिटी के पन्ने के नाम से सीटी बजाना शुरू किया है जिसमें समझने लायक कुछ नहीं लिखा होता सिवाय प्रायोजित फ़ोटो और बेहूदा कार्यक्रमों के। इसी तरह हर गली मुहल्ले के केबल वाले भी रात को कुछ निश्चित कार्यक्रम दिखाते हैं जिनके दर्शक सुबह उठकर सबसे पहला काम सभ्यता को रौंदने का ही करते हैं। ज़्यादातर लड़कियाँ रोड पर चलते हुए अपनी देह की परीक्षा देती हुई नज़र आती हैं। अगर किसी मनचले ने उनको छेड़ दिया या उनका मोबाइल नंबर माँग लिया तो समझो वे अपनी देह परीक्षा में पास हो गईं और कल से रिज़ल्ट हाथ में आने का इंतज़ार करती नज़र आती हैं। स्कूल-कॉलेज और गलियारे से निकलकर यह जवान कुसंस्कृति बाग़-बग़ीचों में भी कुछ-कुछ करते हुए दिख जाती है। बेचारे बुजुर्गों को वहाँ भी चैन नही।

बदलाव प्रकृति का नियम है। संस्कृति और सभ्यता भी बदलती है, लेकिन उसके मूल्यों में बदलाव आने का मतलब है कि वह राष्‍ट्र और समाज नष्ट होने की कगार पर है। वक्त की बयार की गति के साथ ही हमारी संस्कृति की रेत उड़कर कहीं और नया आकर लेती है। मुझे एक वाकया याद है कि एक साक्षात्कार में भूटान नरेश ने कहा था कि कैसे सैटेलाइट चैनलों के प्रसारण पर बाँध लगाकर उन्होंने अपने छोटे से देश की संस्कृति को बचाकर रखा। हमारे देश में प्रगति के मापदंड पर सेंसरशिप को अभिशाप माना जाता है, अनुपम खेर को केंद्रीय फिल्म प्रमाणन बोर्ड से इसलिए बाहर कर दिया गया क्योंकि उनके समय में सबसे अधिक फिल्में जारी हुईं।

मुझे यह बात बहुत बुरी लगती है कि अपने राष्‍ट्र की संप्रभुता पर गर्व करने वाले हम भारतीय अपनी सांस्कृतिक संप्रभुता कि ज़रा-सी भर भी फ़िक्र नहीं करते। उसका कारण यही हो सकता है हमारे देश में फ्रांस की तर्ज पर कभी कोई सांस्कृतिक आंदोलन नहीं हुआ। यहाँ भी नवजागरण लाने की ज़रूरत है। जब अपनी सांस्कृतिक संप्रभुता को बचाने के लिए भूटान जैसा छोटा देश (भौगोलिक दृष्‍टि से छोटा लेकिन इस मामले में हमारे देश से बड़ा) कोई निर्णय लेने में नहीं झिझकता तो आखिर हम ऐसा किस लाभ के लिए कर रहे हैं। हमने मुक्त बाजार और वैश्विक अर्थव्यवस्था के नाम पर अपनी सांस्कृति धरोहरों को विदेशियों के हाथ गिरवी रख दिया। यह सब भारतीय संस्कृति पर डाला जाने वाला मीठा जहर है जिसे हम रोज़ अपने आस-पास देखते हैं, लेकिन पता नहीं क्यों कुछ बोलते नहीं। एक कहावत है कि जिस घर में लड़कियाँ नहीं होतीं उस घर में देहली तो है। मतलब यह कि आज आप के बच्चे इस अपसंस्कृति का शिकार भले नहीं बन रहे हों लेकिन आगे आने वाला कल भी तो आपके साथ है।

 लेखक: सीटीवादक

केवल एक दिन महिलाओं के लिए?

Indian Woman

8 मई महिला दिवस है। विकसित कहे जाने वाले देश और समाज जैसे इंग्लैंड या अमेरिका में भी महिलाओं के साथ हिंसक घटनाएँ उनके पति या परिवार वालों के द्वारा ही होती रहतीं हैं। भारत में ‍इसकी जितनी ख़बरें छपतीं या प्रसारित होतीं हैं उससे कहीं अधिक नेपथ्य में रह जातीं हैं। पुराने जमाने में महिलाओं को उसके मृत पति के साथ जिंदा जला दिया जाता था (छुटपुट घटनाएँ आज भी हो जातीं है) तो आज लड़की को मार कर तंदूर में जला दिया जाता है और उसके अपराधी को सजा तक नहीं होती (अभी अभी हुई है)। बार में लड़की ने शराब देने से इंकार कर दिया तो गोली मार दी। तेरह वर्षीय अमीना को सत्तर साल के शेख के साथ बाँध दिया। कुछ सौ रुपयों में कमला को खरीदा जा सकता है। नशे की झोंक में तलाक दे दिया। पति लापता हो गया तो गुड़िया की शादी किसी और से कर दी (उससे पूछा भी नहीं होगा), जब पहला पति लौट आया तो समाज के ठेकेदार तय करने लगे कि अब गुड़िया किसके साथ रहेगी। गुड़िया क्यों नहीं फैसला कर सकती कि उसे किसके साथ रहना है। गुड़िया सवाल क्यों नहीं कर सकती कि उसकी शादी किसी से भी क्यों की जा रही है। ससुर ने बहू के साथ बलात्कार किया तो फतवा जारी हो गया कि महिला अब उसके पति के लिए हराम है। इन घटनाओं पर मीडिया ने मेहबानी दिखाई (अपनी टीआरपी बढ़ाने के लिए) और ये सामने आईं। देवदासी प्रथा बहुत कम हो गई है परंतु पूरी समाप्त नहीं हुई है। कुछ विशेष समाजों में परिवार की बड़ी लड़की को वेश्यावृत्ति करनी होती है और यह उनके समाज में मान्य भी है। कुछ समाजों में स्त्री को स्वयं को सच्चरित्र सिद्ध करने के लिए अग्नि परीक्षा देनी होती है। इसके लिए उबलते तेल में हाथ डालना होता है या हथेली पर पान का पत्ता रख कर उस पर लाल तपी हुई लोहे की सलाख रखनी होती है, यदि इस प्रक्रिया में स्त्री को कोई नुकसान नहीं होता तो उसे पवित्र मान लिया जाता है। अब कल्पना करें क्या ऐसा होता होगा? यह तो उनके जीवन में होने वाली घटनाएँ हैं, कई लोग तो लड़कियों को जन्म लेने से पहले ही मार देते हैं। क़ानून होने के बाद भी कई चिकित्सक भ्रूण लिंग परीक्षण करते हैं और घोषित करने की मोटी रकम लेते हैं। विषय और घटनाक्रम अनेक हैं जो लिखे जा सकते हैं।
हर साल की तरह इस बार भी समारोह होंगें, घोषणाएँ होंगीं, परिचर्चाएँ होंगीं और भाग लेने वाली महिलाएँ (पुरुष भी हो सकते हैं) होंगीं कोई नेता, फ़िल्म स्टार, किसी बड़े उद्योगपति या अधिकारी की पत्नी। लगभग इन सभी महिलाओं ने बचपन से लेकर वर्तमान समय तक शायद ही कभी ग्रामीण या निम्न वर्ग (आर्थिक रूप से, यहाँ जाति या समाज का संदर्भ न लें) की महिलाओं के जीवन को निकट से देखा होगा। गाँवों में स्त्रियाँ सुबह अँधेरे से उठ कर घर के सारे काम करके खेतों में भी पति के साथ मेहनत करती हैं और शाम को घर आकर फिर भोजन आदि घर के कार्यों में जुट जाती है। क्या केवल गाँवों में ही ऐसी स्थिति है, बिलकुल नहीं यह स्थिति किसी शहरी नौकरीपेशा मध्यमवर्गीय परिवार में भी मिल सकती है और श्रमिक वर्ग में भी। घरेलू हिंसा पर क़ानून बन गया पर भारतीय समाज का ताना बाना कुछ ऐसा है कि शायद कुछ ही महिलाएँ परिवार के सदस्यों के विरुद्ध क़ानून की मदद ले। भारत की वह तस्वीर बहुत भली मालूम होती है जिसमें कोई महिला वकील है, कोई डॉक्टर है, कोई पायलट है, कोई सेना में है, पुलिस में है, सॉफ़्टवेयर इंजीनियर है, ये है, वो है, सब कुछ है, हर क्षे‍त्र में है। परंतु इसका अनुपात उतना ही है जैसे किसी समुद्र में तैरते हिमखंड का पानी के ऊपर का भाग। उसका जो नब्बे प्रतिशत भाग पानी में रहता और नज़र नहीं आता, कमोबेश वही स्थिति इस चमकीले परिदृश्य से परे महिलाओं की है। अधिसंख्य लड़कियाँ विद्यालय का मुँह भी नहीं देख पाती। बहुतों को प्राथमिक और माध्यमिक के बाद विद्यालय छोड़ना पड़ता है, इनमें से अधिकांश का विवाह हो जाता है। इस समय इनकी उम्र अठाहर वर्ष से कम ही होती है। अधिकतर परिवारों में माता-पिता मजदूरी पर जाते हैं तो बड़ी लड़की को अपने छोटे भाई बहन को संभालने के लिए घर रहना होता है। ऐसे में स्कूल जाने का सवाल ही नहीं उठता। यदि लड़की भाई बहनों सबसे छोटी है तो शायद दो-चार साल विद्यालय जाए परंतु कुछ बड़ी होने पर वहाँ से निकाल लिया जाता है ताकि वह भी कुछ काम करे और घर की आय बढ़े। इतने बड़े परिवार के लिए सभी का काम करना भी जरूरी है क्योंकि माता-पिता को इतनी मजदूरी नहीं मिलती वे अपना परिवार चला सकें। इन बच्चियों का बचपन में ही विवाह हो जाता है और फिर वही चक्र शुरु हो जाता जिससे उनकी माँ गुजरी है। देश के हर भाग में लगभग हर समाज में ये समस्याएँ है जो आज भी मौजूद हैं हालाँकि इनमें कमी जरूर आई है। अनेक संस्थाएँ इस दिशा में काम कर रहीं हैं। महिलाओं का साक्षरता प्रतिशत पहले से बढ़ा है। एक दिन निश्चित रूप से ऐसी घटनाएँ इतिहास की बातें होंगीं और ये पंक्तियाँ भी-

अबला जीवन हाय तेरी यही कहानी
आँचल में है दूध और आँखों में पानी।

कहानी बदल रही है, बदलेगी।