बर्थ सर्टिफिकेट ऑफ़ लॉर्ड रामा

चिट्ठाजगत अधिकृत कड़ी

पवनपुत्र हनुमान बड़े ही चिंतित दिखाई दे रहे थे। उनकी भावभंगिमा से वे किसी उहापोह में लगते थे। आकुल-व्याकुल से वे अपने प्रभु श्रीराम के पास पहुँचे तो उन्हें ऐसे बदहवास देख कर भगवान राम भी घबरा उठे।
Hanuman

प्रभु बोले, ‘हनुमान ये क्या दशा हो गई तुम्हारी? लोग अपनी चिन्ताओं, दु:खों के निवारण के लिए तुम्हारे पास आते हैं और तुम स्वयं ही व्यथित लग रहे हो? क्या लोगों के दु:ख से दु:खी हो गए हो?’
हनुमान बोले, ‘प्रभु बात तो बड़ी गंभीर है। मेरे अस्तित्व डावाँडोल हो गया है। मुझे ऐसा लगने लगा है कि मैं हूँ भी या नहीं।’
‘क्या हुआ तुम्हारे अस्तित्व को? अच्छा भला हो तो है।’
‘बात ये है प्रभु अभी अभी जम्बू द्वीप के शासक और शासक के नियंत्रक और समर्थकों ने आपके अस्तित्व को ही नकार दिया है। उनका कहना है कि राम केवल काल्पनिक चरित्र है और रामायण के पात्र और इसके घटनाक्रम का कोई ऐतिहासिक और वैज्ञानिक प्रमाण नहीं हैं और रामसेतु जैसा तो कुछ है ही नहीं। इस आर्यावर्त के पुरातत्वविदों ने भी कुछ ऐसा ही विश्लेषण किया है।
राम ने कहा, ‘तो इसमें तुम क्यों चिंतित होते हो? ये तो मेरे अस्तित्व पर प्रश्नचिह्न है और मुझे इसकी कोई चिंता नहीं है।’

पवनपुत्र ने बड़ी व्यग्रता से कहा, ‘यही तो दु:ख की बात है कि आपके अस्तित्व से मेरा अस्तित्व जुड़ा है। यदि राम नहीं है तो हनुमान तो है ही नहीं। आज भारत में आपसे भी अधिक मेरे भक्त हैं क्योंकि अब जनता जानती है कि नेता से ज़्यादा उसका पीए या सेक्रेटरी काम का होता है। इसलिए जैसे नेताओं के लिए ज़िन्दाबाद के नारे जनता लगाती ज़रूर है परंतु काम करवाने के लिए उसके सेक्रेटरी के पास जाती है। ऐसे ही देश की जनता नेताओं के साथ जयसियाराम के नारे अवश्य लगाती है परंतु संकट के समय आपके पास नहीं मेरे पास आती है। कारण यह है कि मेरे पास यह गदा है और मेरे पराक्रम और शक्ति की गाथाएँ तो प्राचीन काल से प्रचलित हैं। आज लोगों को यह पता है कि काम करवाने या संरक्षण के लिए किसी ‘बाहुबली’ की ज़रूरत होती है इसलिए वो आपके बजाय मेरे पास आते हैं।’
‘तो हनुमान क्या लोग मेरे पराक्रम को भूल गए हैं?’
‘नहीं प्रभु बात वो नहीं है। लोग जानते हैं कि कोई बाहुबली, सांसद या विधायक बन जाता है तो स्वयं के बाहुबल का प्रयोग नहीं करता फिर वह अपने किसी असिस्टेंट के बाहुबल को प्रमोट करता है। शायद इसीलिए लोग मेरे पास आते हैं और आने वालों में अपना काम करवाने वाले कम हैं अधिकतर तो शनिदेव से बचने के लिए मेरे पास आ जाते हैं क्योंकि वो जानते हैं कि मेरे इलाके में शनिदेव की नहीं चलती।’
‘परंतु हनुमान जहाँ तक मैं जानता हूँ कि ये आधुनिक बाहुबली तो निर्बलों, निर्दोषों पर बलप्रदर्शन करते हैं। ये तो हमारी नीति नहीं रही है।’
‘हाँ प्रभु ये सही है परंतु आज ऐसे बाहुबली ही संसद या विधानसभा में पहुँचते हैं।’
अचानक हनुमान कुछ याद करके बोले, ‘हे राम, बात तो मुद्दे से भटक रही हैं मैं तो यहाँ पर आपके और मेरे अस्तित्व की बात करने आया था।’
श्रीराम बोले, ‘हाँ हाँ, कहो महावीर क्या कहना चाहते हो?’
‘भगवन् मैं यह कहना चाहता हूँ कि त्रेतायुग में ही यदि तात दशरथ ने आपका जन्म प्रमाणपत्र यानी बर्थ सर्टिफ़िकेट बनवा लिया होता तो आज ये दिन नहीं देखना पड़ता। मेरे पिता केसरी ने भी जन्म प्रमाणपत्र नहीं बनवाया।’
‘तब तो ऐसा कोई प्रावधान नहीं था।’
‘परंतु प्रभु अब ये बहुत आवश्यक है।’
‘पवनपुत्र किसी मनुष्य या किसी भी प्राणी के जन्म लेने पर उसके लिए अलग से किस प्रमाण की आवश्यकता है?’
‘आवश्यकता है प्रभु। यदि इस समय आप जम्बू द्वीप जाएँ और कहें कि आप ही वह रघुवंशी राम हैं जिसने रावण का नाश किया था तो लोग सबसे आपके होने का प्रमाण माँगेगे। किसी भी व्यक्ति का जन्म प्रमाणपत्र ही यह सिद्ध करता है कि इस नाम के व्यक्ति ने फलाँ-फलाँ तारीख़ और समय को फलाँ शहर में जन्म लिया था।’
‘हनुमान शायद मानव ने बहुत अधिक विकास कर लिया है।’
‘पता नहीं प्रभु, परंतु इस जन्म प्रमाणपत्र के बिना गुरुकुल, मेरा तात्पर्य है कि स्कूल का प्रिंसिपल मानेगा ही नहीं कि इस बच्चे ने जन्म भी लिया है।’
इस श्रीराम ने कहा, ‘ठीक है हनुमान तुम्हारे लिए तो तुलसी बाबा ने कहा ही है ‘रामकाज करिबै को रसिया’, तो तुम मेरा जन्म प्रमाणपत्र अब बनवा लो और सरकार को प्रस्तुत कर दो साथ अपनी भ‍ी बनवा लेना।’
अंजनिपुत्र इस पर भड़क गए, ‘नहीं प्रभु, आप चाहें तो मैं फिर से एक छलांग में लंका जा सकता हूँ, आप चाहें तो मैं फिर से संजीवन‍ी बूटी के लिए पूरा गंधमादन पर्वत लाकर दे सकता हूँ। परंतु ये जन्म प्रमाणपत्र का काम मुझसे नहीं होगा। वो नगरपालिका वाले मुझसे इतने चक्कर कटवा लेंगे कि मैं अपनी पवनवेग से चलने की शक्ति ही खो बैठूँगा। वैसे मेरे भक्त नगरपालिका के जन्म-मृत्यु विभाग में हैं परंतु यदि मैं अपने मूल स्वरूप गया तो मुझे बहरूपिया समझकर टरका देंगे और यदि सामान्य मानव के रूप में जाऊँ तो उत्कोच के लिए मेरे पास धन नहीं है।’
श्रीराम ने यह सुनकर बहुत गंभीरता से कहा, ‘मारुतिनंदन, चाहे जो हो तुम यह काम तो कर ही लो। तुम्हारे और मेरे जन्म प्रमाणपत्र के साथ-साथ भरत, लक्ष्मण, शत्रुघ्न, सीता और हाँ लव-कुश का जन्म प्रमाणपत्र भी बनवा लेना। देखो हनुमान ये काम तो तुम्हें करना ही है क्योंकि बात मुझे भी समझ में आ गई है कि आज के युग में जम्बू द्वीप में हम सबके अस्तित्व के लिए जन्म प्रमाणपत्र अति आवश्यक है। तुम धन मुझसे ले लो, अपने किसी भक्त को पकड़ो और शीघ्र ही इस कार्य को पूर्ण करो।’
(हनुमान फिर से रामकाज को निकल पड़े हैं, क्या है कोई चिट्ठाकार, टिप्पणीकार, पाठक जो हनुमान के काम का ठेका ले सके।)

चिट्ठाजगत पर सम्बन्धित: हनुमान, राम, जन्म, प्रमाणपत्र, रामसेतु, Hanuman, Rama, Birth, Certificate, Ramsetu,

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अथ श्वानगाथा: Dogma of Dogs

कुत्ते इस बात पर नाराज हो ही गए कि उनके नाम को मनुष्य जब-तब जहाँ-तहाँ घसीटता रहता है। आखिर कब तक यह सब सहते रहेंगे। कोई तो सीमा होनी चाहिए। अब तो चिट्ठाजगत में भी उनके नाम का दुरुपयोग हो रहा है और यह सब ‘कौवों के राजा’ अर्थात काकेश का किया धरा है। मोहल्ले का नाम ले लेकर हमें कोसा है।

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कुत्तों के मुखिया ने एक आपातकालीन बैठक बुलाई। उसने संबोधित किया, ‘हे श्वानवीरो, आज हम फैसला करके रहेंगे। यदि मनुष्य हमें इसी प्रकार बेइज्जत करता रहा तो हमें उस पर मानहानि का मुकदमा करना होगा। फ़िल्मों में हमेशा विलेन को हमारे नाम से ही गालियाँ दी जाती रहीं हैं। ये काम सबसे ज्यादा धरमिंदर ने किया है। हमारे दादा के जमाने में सत्तर के दशक में पूरे देश में इनका डायलॉग गूँजा था – बसंती इन कुत्तों के सामने मत नाचना – उसने क्या सोचा था कि देश के सारे कुत्ते बसंती का नाच देखने को ही उधार बैठे थे और यदि उसका नाच देख भी लेते तो क्या पहाड़ टूट जाता।’
एक युवा कुत्ते ने समझाया, ‘दद्दा, वो हमें नहीं गब्बर और उसके साथियों को कुत्ता कह रहा था।’
मुखिया ने तनिक गुर्राया और बोला, ‘हाँ यही तो तकलीफ है कि हमारी तुलना गब्बर और उसके गिरोह से की गई। बेशक हमारे गिरोह होते हैं। परंतु हम लूटपाट नहीं करते। अरे हम तो अपने पेट से अधिक कभी नहीं चाहते। फिर भी ये इंसान हमेशा हमारे नाम लेकर एक दूसरे को गरियाता है।’
‘सबसे अधिक नाराज़ तो मैं इसी धरमिंदर से हूँ, हर दूसरी फ़िल्म में बोलता है – कुत्ते, कमीने मैं तेरा ख़ून पी जाऊँगा – जैसे हमारा ख़ून कोई कोल्ड्रिंक है। अरे ये इंसान हमारा ख़ून पी ले तो उसके ख़ून में भी वफादारी आ जाए, पिए तो सही एक बार।

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कुत्तों का सचिव गंभीर होकर बोला, ‘ये तो बिलकुल ग़लत है कि उसने कुत्ते के साथ कमीना भी कहा। कोई भी कुत्ता कमीना नहीं होता। एक टुकड़ा भी रोटी का दिया तो जिन्दगी भर साथ दिया है हमने। और तो और कई बार फ़िल्मों का विलेन कोई नेता होता है, तब भी वही डायलॉग – कुत्ते, कमीने….. – ये तो हद हो गई, इन नेताओं से तो गब्बर ही अच्छा था उसके उसूल तो थे।

कुछ कुत्ते नए जमाने के थे, तकनीक वगैरह में भी दखल रखते थे, उनमें से एक बोला, ‘अभी पिछले दिनों हिन्दी चिट्ठाजगत के धुरंधर व्यंग्यकार स्वामी समीरानंद ने मूषकों की व्यथा कही थी। चूँकि वे हमेशा व्यंगात्मक लेखन करते हैं, इसलिए मैं समझा वे कम्प्यूटर के माउस को मूषक कह कर मौज ले रहे होंगे। मैं तो माउस के बारे में कुछ नया सोच कर उनके चिट्ठे पर गया था, वहाँ देखा तो वे भगवान गजानन के वाहन मूषक की बात कर रहे थे। उनके चिट्ठे से एक बात मालूम हो गई कि लोगों के घर के सामने पड़े मरे चूहों को हमारे जिन साथियों ने खाया वे मर क्यों गए। दरअसल वे मनुष्य द्वारा रखी गई चूहामार दवा से मरे चूहे थे पर हमारे लिए तो यह फ़ूड पॉइज़निंग का केस हो गया।’

शेम-शेम शेम-शेम के स्वर सुनाई देने लगे।

कुछ दुर्लभ कुत्ते, जिन्होंने नेताओं को काट लिया था, कहने लगे, ‘अच्छा मौका है हम चूहों से गठजोड़ कर लेते हैं। वे भी इंसानों से परेशान हैं, हमारे पक्ष में जरूर आ जाएँगे। बदले में हमें उनके लिए बिल्ली पार्टी के विरुद्ध कैम्पेन कर देंगे। वैसे भी बिल्ली पार्टी से हमारे मतभेद हमेशा रहे हैं।’

इतना सुनते ही मुखिया भड़क उठा, ‘तुम चुप ही रहो तो अच्छा है। नेताओं को काटने से उनके गुण तुममें आ गए हैं, उन्हीं की भाषा बोलने लगे, अपना कुत्तत्व ही भूल गए, लानत है तुम पर।’
एक नन्हें छौने से श्वान शिशु ने उसकी माँ से पूछा, ‘माँ, ये कुत्तत्व क्या होता है?’ 
‘बेटा, कुत्तत्व ही हमारी मूल प्रवृत्ति है, ये हमें जन्म से मिलती है। एक मनुष्य अपना मनुष्यत्व छोड़ सकता है परंतु हम कुत्तत्व कभी नहीं छोड़ते‘, माँ ने गर्व से कहा।      
तभी एक किशोर कुतिया बोली, ‘दादू-दादू, ये इंसान हमेशा हमारी पूँछ को लेकर हमारा मजाक उड़ाता रहता है कि कुत्ते की पूँछ टेढ़ी की टेढ़ी।’
बूढ़े मुखिया ने समझाया, ‘नहीं नहीं, तुम मनुष्यों की कहावतों पर ध्यान मत दो। ये मनुष्य जानवरों पर कहावत भी बनाता है तो उसकी अपनी समझ से, जो कि हम जानवरों से बहुत कम है। हमारी पूँछ हमेशा टेढ़ी रहती है और वह हमारे चरित्र की दृढ़ता का प्रतीक है। ऐसी चारित्रिक दृढ़ता मनुष्य में कहाँ, उसकी पूँछ होती तो वह कोशिश कर भी सकता था। बेटी तुम्हें अपनी टेढ़ी पूँछ पर गर्व होना चाहिए। तुम देख लो किसी भी कुत्ते की पूँछ कभी सीधी नहीं होती। कुत्ता कितना ही कुपोषित क्यों न हो जाए उसकी दुम का अंतिम सिरा मुड़ा हुआ ही मिलेगा, अर्थात् भूख भी हमें अपने चरित्र से नहीं डिगा सकती, और ये मनुष्य है कि सात पीढ़ीयों के लिए भंडार भरा है फिर भी नीयत डोलती रही है।

किशोरी ने फिर अपनी बात रखी, ‘दादू, ‘क’ से कुत्ता होता है, परंतु वो जितेन्द्र सुता (मेरा पन्ना वाले नहीं, फ़िल्म स्टार जीतेंदर की पुत्री) है ना, वो टीवी पर ‘क’ से शुरु होने वाले बड़े ही भीषण सीरियल बनाती रहती है। मुझे तो देख कर डर लगता है। पता नहीं ये मनुष्य रोज इन सीरियल्स को कैसे देख लेता है। देखता ही बल्कि वैसी हरकतें भी करने लगा है। इसका बिजनेस बिगाड़ा, उसका घर उजाड़ा, हमेशा विध्वंस की ही बात होती रहती है, जैसे इनके जीवन में, धरती में कुछ अच्छा है ही नहीं।

दादू ने समझाया, ‘बेटी, यदि ये सीरियल नहीं होते तो भी ये मनुष्य बिगाड़ना, उजाड़ना, विध्वंस जैसे काम करता ही करता। आतंकवादियों ने ‘क’ वाले सीरियल थोड़े ही देखे थे।’

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एक छोटे सहमे कुत्ते ने भी शिकायत की, ‘दादू, हमारी प्रजातियों में से एक प्रजाति की पूँछ मनुष्य काट देता है। कहता है कि अधिक लंबी है जो हमारी ट्रेनिंग में भागने दौड़ने में उलझती है। मैं यह नहीं समझ पा रहा हूँ कि भला पूँछ भागने में बाधा कैसे हो सकती है वह तो दौड़ते समय, कूदते समय, मुड़ते समय संतुलन बनाने में सहायक होती है।’

इस बात का किसी के पास कोई जवाब नहीं था।

उस छोटे कुत्ते ने अपनी बात जारी रखी, ‘हमारी कई प्रजातियाँ बड़े बालों वाली है। ये बाल प्रकृति के अनुकूलन में ऐसे हुए हैं, पर मनुष्य उन्हें अपने हिसाब से काट-छाँट देता है और सोचता है कि हमें सजा रहा है। हमें ठंड लगे या गर्मी इससे उसे कोई मतलब नहीं। कई बार हमारी दौड़ करवाता है, नकली खरगोश के पीछे हमें दौड़ाता है। हमें तो बाद में पता चलता है कि खरगोश नकली था। हम भोले जीव हर बार खरगोश को असली समझ कर दौड़ जाते हैं।’  

यह सुनकर एक हड़का कुत्ता (हड़का कुत्ता वो कुत्ता होता है जिसमें मनुष्य के कुछ गुण आ जाते हैं और वो अपने वालों को भी काट लेता है) बीच में बोल उठा, ‘अरे नन्नू बोल तो सई, किसके पेट में इंजेक्शन लगवाना है। बस मेरे काटने की ही देर है।’

मुखिया ने उसे चुप किया और अचानक कुछ याद करते हुए बोले, ‘असल बात तो हम भूल ही गए, हम यहाँ पर कागाधिराज काकेश के कारण इकट्ठा हुए हैं। उन्होंने हम पर बहुत ही ग़लत इल्जाम लगाए हैं। उन्होंने लिखा है कि एक मोहल्ले में आजकल कुछ कुत्तों ने डेरा जमा लिया है और हर आने जाने वाले पर पहले गुर्राते हैं फिर काट लेते हैं। ये तो बिलकुल ही ग़लत बात है। हम कुत्ते शुरु से ही एक नहीं हर मोहल्ले में रहते आए हैं। हम न हों तो मोहल्ला वीरान हो जाए। हर कुत्ते का अपना समूह होता है और कुत्तों के हर समूह का एक मोहल्ला होता है। हमारी अपनी सीमाएँ होती हैं। उसमें हम दखलंदाजी पसंद नहीं करते। जैसे ही किसी कुत्ते ने दूसरे मोहल्ले में प्रवेश किया तो उस मोहल्ले का पूरा गुट उसे मोहल्ले से बाहर खदेड़ का आता है और दूसरे मोहल्ले की सीमा शुरु होते ही हम आगे नहीं जाते, वहाँ से वापस लौट आते हैं। गौर करें कि हमें न तो अपनी सीमा मे किसी का, यहाँ तक कि कुत्तों तक का भी अतिक्रमण पसंद है ना ही हम किसी दूसरे की सीमा में अतिक्रमण करते हैं। पर ये इंसान हमेशा दूसरे के फटे मे टांग अड़ाता रहता है। फिर गुर्राने और काटने की बात अर्द्धसत्य है। देखिए, दिन में तो हम काटते ही नहीं। हम प्रकृति के साथ चलने वाले जीव हैं। अरे भई रात होती है सोने के लिए, उस समय कोई मनुष्य गली में निकल आए तो हम उसे दौड़ा लेते हैं कि भाई घर जाकर सोजा। अब इसमें क्या ग़लत है। हाँ कुछ नालायक कुत्ते दिन में भी भागदौड़ का खेल खेलते रहते हैं, यह ज़रूर ग़लत है। और फिर हम अपने मोहल्ले की सीमा तक ही दौड़ाते हैं और भौंक भौंक कर अगले मोहल्ले को आगाह कर देते हैं कि भाई लोगों, भेज रहे हैं एक को, सम्भाल लेना। यदि व्यक्ति बाइक पर हो तो उसे धूम ईश्टाइल की भी प्रेक्टिस करा देते हैं।’

‘दूसरी बात हम कुत्तों का कोई हिडन एजेंडा नहीं होता। यह नितांत मानवीय गुण है। यह हममें नहीं पाया जाता।’
 
‘रही बात ‘सारा’ बिटिया की तो उसे कुत्तों ने नहीं पाखंडी इंसानों ने ही डराया है। अरे हम तो उसे भौंक भौंक कर चेताते रहते हैं कि सारा अभी तुम हमारी तरह निश्छल हो, इन बड़े लोगों के पाखंड में मत फँसना। बड़ी होकर किसी भी बात को सही ग़लत अपनी समझ से आँकना। हमेशा खुली हवा में साँस लेना। ये ढोंगी तुम्हें कुएँ का मेढक बनाने में कोई कसर बाकी नहीं रखेंगे। वो तो हमारी बात समझ जाती है पर बड़े नहीं समझते क्योंकि उनके दिमाग पर ज्ञान के अनेक आवरण पड़े रहते हैं।’
 
‘और भला ये मोहल्ले के कुत्तों को अवॉईड करने की क्या बात कही। समर्थन करना, बायकॉट करना, अवॉइड करना, ये सब इंसानो की फितरत है। अरे हम तो रात रात भर जाग कर मोहल्ले के हर घर की रखवाली करते हैं। हम तो किसी भी घर को अवॉइड नही करते, वो चाहे हिन्दु, मुसलमान, दलित, सवर्ण किसी का भी हो।
 
‘वर्चुअल डाकियों पर हमारे बुद्धिजीवी कुत्ते शोध कर रहे हैं इसलिए अभी नो कमेंट्स। परंतु जब से रीयल डाकियों ने खाकी ड्रेस पहनना छोड़ दिया है हम उन्हें नहीं दौड़ाते हैं। खाकी पेंट शर्ट से बड़ा भ्रम रहता था। इसलिए हम सभी खाकीधारी को दौड़ा लेते थे। अब तो डाकिये नीली वर्दी पहनते हैं। इसलिए वे बेखटके डाक बाँट सकते हैं।’

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कुछ बुद्धिजीवी कुत्ते इतनी देर से सारी बातें सुन रहे थे। हालाँकि बुजुर्ग कुत्तों ने इन्हें बहुत समझाया था चंद किताबें पढ़ कर खुद को बुद्धिजीवी मत समझो। हर प्राणी अपनी बुद्धि से ही जीता है। ये इंसान ने ही बुद्धिजीवी-श्रमजीवी का भेद बना रखा है। बुद्धिजीवी मतलब मेहनत कौड़ी की नहीं और नाम व दाम जमाने भर का, उधर जो श्रमजीवी परिश्रम कर रहा है उस बेचारे के श्रम के फल का हिस्सा भी बुद्धिजीवी हड़प लेते हैं और श्रम करने वाले को दो जून की रोटी भी नसीब नहीं होती। 

बुद्धिजीवी कुत्ते बोले, ‘कागभुसुंडि काकेश अपने वालों का ही ख्याल रखते हैं। अब देखिए हमारी तो लानत मलामत की और कौवों की तारीफ में पोस्ट लिख डाली। ढूँढ ढूँढ कर कविताएँ भी डाली हैं कौवों के लिए। भगवान कृष्ण के हाथ से कौवे माखन रोटी ले जाते हैं। वाह! क्या किस्मत है कौवों की? यदि दरवाजे पर या मुंडेर पर कौवा बोले तो शुभ होता है, उसकी चोंच सोने से मढ़ा देंगे और यदि हम जरा दरवाजे पर भौंक दें तो हमें डंडा मार कर भगा दिया जाता है। रात को कभी कभी हम अपने दुख व्यक्त करने के लिए हूऽऽऽऽऽ हूऽऽऽऽऽऽ करके थोड़ा रो लें तो उसे अपशकुन माना जाता है। हमने बहुतेरा ढूँढा पर हमें कुत्तों पर कोई कविता नहीं मिली। अलबत्ता हमारी वफादारी पर कुछ आलेख जरूर मिल जाते हैं।’

एक कवि प्रकृ‍‍ति कुत्ता बोला, ‘काश दुष्यंत कुमार हम पर ही कुछ लिख देते, जैसे उन्होंने साँप के लिए लिखा था।

श्वान, तुम सभ्य तो हुए नहीं,
भले ही नगर में आया बसना,
एक बार पूछूँ उत्तर दोगे,
क्यों (मनुष्यों जैसे) सीखा काटना, दुम हिलाना।

कवि कुकुर ने कहा, ‘और इस सभा की रिपोर्टिंग के लिए कोई चिट्ठाकार बुलाया है या नहीं?’

इस पर इंटरनेट का लती कुत्ता बोला, ‘हाँ, बिलकुल लाए हैं, अभी पिछले दिनों चिट्ठाकार भाटियाजी सभी चिट्ठाकारों को आईना दिखा कर चिट्ठा हिट करने के नुस्खे बता रहे थे। इनके 20 वें नंबर के नुस्‍खे में लिखा ‍है कि चिट्ठा ‘म’ से शुरु होना अच्छी बात होती है। इसलिए मैं ‘मालव संदेश’ वाले अतुल शर्मा को ले आया हूँ।’

सारे श्वान कुछ दुखी हो गए। आखिर कवि कुत्ते से रहा न गया, उसने कहा, ‘ये किस चूँ चूँ के मुरब्बे को पकड़ लाए। इसका हिट काउंटर देखा है, दहाई का आँकड़ा भी पार कर ले तो गनीमत है। कम से कम उड़न तश्तरी वाले समीर लाल को लेकर आते तो वो हमारे लिए पोस्ट के अंत में एक कविता तो लिखते-

इंसानो ने काम किए पर,
कुत्तों पर इल्जाम हो गया।

नेट वाले कुत्ते ने समझाया, ‘भाई, एक ये बंदा ही काम से भी फुरसतिया था इसलिए इसे ही ले आए। ये ज्यादा लिखता करता तो है नहीं, बस इधर उधर टिपियाता रहता है और आधी से ज्यादा टिप्पणियाँ तो मॉडरेशन की भेंट चढ़ जातीं हैं।’   

अंत में एक श्वान जो कुछ ज्यादा ही बुद्धिजीवी था, इतना ज्यादा कि शोध वगैरह भी करता रहता था, उसने अपने शोध कार्य से जो निष्कर्ष निकाला था उसे सभी कुक्कुरों के सामने रखा।
उसने बताया, ‘ये जो मनुष्य आज कहता फिरता है – मेरा शानदार बंगला, मेरी शानदार गाड़ी, मेरे शानदार कपड़े, जूते, शानदार ये, शानदार वो। इसके पीछे पुरातात्विक कारण हैं।’
‘हम कुत्तों को पालना प्राचीन काल से ही बहुत सम्मान का कार्य माना जाता था। यहाँ तक कि धर्मराज युधिष्ठिर के स्वर्गारोहण के समय उनका कुत्ता ही धर्म के रूप में उनके साथ गया था। उनके भाईयों और पत्नी ने रास्ते में ही साथ छोड़ दिया था परंतु कुत्ते ने अंत तक साथ निभाया था। धर्मराज ने स्वर्ग के यान में चढ़ने के लिए शर्त रखी थी कि ये कुत्ता भी उनके साथ स्वर्ग में जाएगा अन्यथा वे भी स्वर्ग में नहीं जाएँगे।’
‘प्राचीन काल में जो लोग कुत्ता पालते थे उन्हें सम्मान से ‘श्वानदार’ कहा जाता था। यही ‘श्वानदार’ शब्द बिगड़ कर ‘शानदार’ हो गया और आज हर श्रेष्ठ वस्तु के लिए मनुष्य कहता है ‘शानदार’।’

सभी श्वान साधु-साधु कर उठे। उनके पंचम स्वर में साधु-साधु सुनकर लोगों की नींद खुल गई और उन्होंने कुत्तों पर पत्थर फेंकना शुरु कर दिए। पत्थरों की बरसात होते ही सारी श्वान बिरादरी तितर-बितर हो गई और भागते भागते अगली मीटिंग का समय और ऐजेंडा तय करती गई।

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उद्घोषणा (बतर्ज काकेश भाई): ये आलेख कागाधिराज काकेश महोदय और स्वामी समीरानंद के चिट्ठों पर जाने से मिले संक्रमण के कारण बन गया है। इसलिए तेरा तुझको अर्पण के भाव से ये आलेख इन्हीं को समर्पित है। दिमाग के इस फितूर का किसी भी जीवित या अजीवित व्यक्ति से कोई संबंध नहीं है। यदि ऐसा होता है तो इसे कोई कारण संयोग माना जाना चाहिए। यदि कोई श्वानों के पक्ष या विपक्ष में कोई बात रखना चाहता है तो टिप्पणी के माध्यम से कह सकता है। टिप्पणियाँ केवल श्वानों पर ही स्वीकार की जाएँगी। अनाम टिप्पणियाँ श्वानों की ओर से स्वीकृत की जाएँगी।  

विक्रम वेताल और निठारी

तांत्रिक को फिर कोई मंत्र सिद्ध करना था। पहले इस काम के लिए महाराज विक्रम ने उसकी मदद की थी। विक्रम ने उसे वेताल लाकर दिया था। वेताल विक्रम के कंधे से चौबीस बार उतर कर वापस पेड़ पर जा लटका था और पच्च‍ीसवीं बार में विक्रम उसे पकड़ कर लाया था। हर बार अर्थात् पच्चीस बार बेताल ने विक्रम को कहानियाँ सुनाई इससे तांत्रिक की मंत्रसिद्धि में भी देर हो गई थी। विक्रम के आने पर तांत्रिक ने कहा, ”विक्रम मुझे एक बार फिर मंत्र सिद्ध करना है और इसमें तुम्हारी मदद की आवश्यकता है।” विक्रम ने उत्तर दिया, ”आप चिंता न करें, मुझे इस काम का अच्छा अनुभव है। पिछली बार भी वेताल मेरे पास से चौबीस बार भाग गया था। फिर भी मैं हिम्मत नहीं हारा और पच्चीसवीं बार में उसे लेकर आ ही गया था। जो कहानियाँ उसने मुझे उस समय सुनाईं थी वे आज पूरे विश्व में वेताल पच्चीसी के नाम से पढी जातीं हैं।” यह सुनकर तांत्रिक बोला, ”राजन्, इस बार कार्य कठिन है। पहले तो केवल एक वेताल की ही आवश्यकता थी, परंतु अब इस मंत्र सिद्धि के लिए मुझे 108 बच्चों की हड्डियों की आहूति देना है। क्या तुम ऐसा कर सकोगे?” इस पर विक्रम ने कहा, ”108 कोई बड़ी संख्या नहीं है, यह तो पहले से भी अधिक आसान कार्य है। ये तो बच्चे हैं, इन्हें तो कहानियाँ भी नहीं आती होंगी। आज इक्कीसवीं सदी के भारत में बच्चों की ‍हड्डियाँ लाना कोई कठिन काम नहीं है। सबसे पहले तो मै निठारी जाऊँगा, वहाँ पर बहुत स्कोप है। यदि वहाँ से पूर्ति नहीं होती है तो भारत में कहीं भी निकल जाऊँगा। बच्चों की हड्डियाँ तो सभी जगह मिल जाएँगी क्योंकि ये ही सबसे आसान शिकार हैं। घर में, स्कूल में, पास में, पड़ोस में, कहीं भी इन्हें  निशाना बनाया जा सकता है। कई बार घरों में तो कभी स्कूलों में इनकी निर्ममता से पिटाई होती है, जबकि इन मासूमों का का अपराध इतना बड़ा नहीं होता। यदि आपको मंत्र सिद्धि में कन्याओं की हड्डियाँ चाहिए तो ये और भी अधिक आसानी से उपलब्ध हो जाएँगी। वैसे तो भारत में कहा जाता है ‘यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते, रमन्ते ‍तत्र देवता’ अर्थात् जहाँ नारियों की पूजा होती है वहाँ देवता वास करते हैं, परंतु लोगों की करनी और कथनी में बहुत अंतर है। इस देश में किसी समय बालिका जन्मते ही उस पर चारपाई का पाया रख कर मार दिया जाता था। या उसके मुँह में नमक भर दिया जाता था। यदि कोई मार न सके तो कचरे में फेंकना सबसे आसान काम है। आज भी प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से लड़कियों को जीने नहीं दिया जाता है। सबसे पहले तो यह पता करते हैं कि आने वाला शिशु लड़की है या लड़का। यदि लड़की है तो कोशिश होती है कि उसे इस दुनिया में ही नहीं आने दिया जाए। यदि कोई परिवार लड़की का गर्भ में आना न जान पाए तो उस बालिका के जन्मते ही उसकी उपेक्षा शुरु हो जाती है। उसे पोषक आहार नहीं मिल पाता है। उसकी समुचित देखभाल नहीं होती है। इसी के चलते कुछ कन्याओं का प्राणांत हो जाता है। यदि यह सख्त जान फिर भी बच निकले तो शादी के बाद जलाने की व्यवस्था भी तो है। इतनी जलालत से जीने के बाद लड़की प्राय: किसी कन्या की माँ बनना नहीं चाहती। मारने वाले लोग किसी बालिका को मारते समय भूल जाते हैं कि माँ, बहन, मौसी, मामी, काकी, दादी, नानी जैसे रिश्ते भी हैं। वे लोग सीता, दुर्गा, गायत्री, सरस्वती, लक्ष्मी आदि देवियों की उपासना करते हैं परंतु अपने घर किसी कन्या का जन्म नहीं चाहते। तांत्रिक महोदय, आप निश्चिंत रहें, निठारी के दैत्यों ने तो दूसरों के बच्चों को मारा। यहाँ तो लोग अपनी ही कन्या की जान ले लेते हैं। 108 तो कुछ नहीं मैं आपको 1008 बच्चों की हड्डियाँ तुरंत लाकर दे सकता हूँ।” इतना कह कर विक्रम निठारी की ओर प्रस्थान कर गया।