और अब हिन्दू शर्ट भी

आज रविरतलामीजी के चिट्ठे रचनाकार में असग़र वजाहत का यात्रा संस्मरण पढ़ रहा था। अचानक चिट्ठे के दाईं ओर गूगल के विज्ञापन कर गई उसमें हिन्दू-इंग्लिश डिक्शनरी  विज्ञापन था। 

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मैंने इस लिंक को क्लिक करके देखा यहाँ पर पहुँचा। लिंक यह है।

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उस साइट पर ‘ए डिक्शनरी ऑफ़ उर्दू क्लासिकल हिन्दू एंड इंग्लिश, डीलक्स 2006 एडिशन’ से मुलाकात हुई। इसी की दाईं ओर ‘हिन्दू शर्ट’ भी है। इन लिंक्स पर जाने पर पता नहीं लगा कि इस डिक्शनरी में क्लासिकल हिन्दू क्या है और ये शर्ट हिन्दू क्यों है। यहाँ शायद हिन्दी को ग़लती से हिन्दू लिख दिया गया है। ये शर्ट आम शर्ट हैं और ईबे द्वारा ऑनलाइन बेचे जा रहे हैं। इन पर कोई भी हिन्दू प्रतीक नहीं हैं।

अब इसे देख कर कोई ‘होहल्ला’ न मचाने लगे कि शर्ट पर भी हिन्दुओं का एकाधिकार हो गया है और हमें कुछ नहीं मिला। अल्पसंख्यकों के लिए इतने शर्ट अलग निकाल कर रख दिए जाएँ।

भैया हम का करें ई तो गूगलवा की ग़लत वर्तनी का कमाल है।

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मुशर्रफ मंशा: श्रीनगर पर पाक झंडा

बेनजीर भुट्टो ने अपनी आत्मकथा ‘डाटर ऑफ़ ईस्ट’ में जोड़े गए नए अध्याय में खुलासा किया है कि परवेश मुशर्रफ ने 1996 में उनसे श्रीनगर पर नियंत्रण कर वहाँ पाकिस्तानी झंडा फहराने की अनुमति माँगी थी। एक पाकिस्तानी साप्ताहिक पत्रिका ने भुट्टो की आत्मकथा के कुछ अंश प्रकाशित किए हैं जिसमें बताया गया कि यदि बेनजीर आदेश दें तो मुशर्रफ श्रीनगर पर पा‍किस्तान का नियंत्रण होगा। बेनजीर के कथनानुसार उन्होंने इसकी इजाज़त नहीं दी। समाचार यहाँ से लिया गया है।
पता नहीं भारतीय गु्प्तचर तंत्र को इसकी जानकारी थी भी या नहीं। हो सकता है जानकारी हो परंतु सामरिक कारणों से इसे उजागर नहीं किया गया हो। वैसे आशंका यही है कि भारतीय तंत्र इस षडयंत्र के बारे में बेख़बर चैंन की बंसी बजा रहा हो क्यों‍कि तीन साल बाद 1999 में इसी मुशर्रफ ने कारगिल पर हमला किया था। अभी इस आत्मकथा के बाज़ार में आने की कोई ख़बर नहीं है। फिर भी जब कभी यह आती है तो भारत के लोगों की सामान्य प्रतिक्रिया यह होगी कि पाकिस्तान विरोधी नारे लगाए जाएँगे, कुछ रैलियाँ-जुलूस वगैरह निकाले जाएँगे और पुतला दहन भी रखा जा सकता है। कुछ दिनों तक यह तमाश चलेगा, मीडिया इस मुद्दे को भुनाएगा और सब शांत हो जाएगा। जनता फिर साह-बहू के सीरियल में निमग्न हो जाएगी। हमारे इसी चरित्र के कारण आज नहीं तो कल निश्चित रूप से ऐसा हो सकता है कि मुशर्रफ नहीं तो कोई और पाकिस्तानी शासक श्रीनगर पर पाकिस्तानी झंडा फहरा दे।

बाज़ार की बयार

[इस आलेख को लिखने वाले स्वयं को सीटीवादक कहलाना पसंद करते हैं। यहाँ ये इसी नाम से आलेख देना चाहते हैं। अब सीटीवादक नाम क्यों, ये तो वे स्वयं ही अपने शब्दों में कभी बताएँगे तो मैं और आप भी जानेंगे, परंतु मैंने इस सीटी बजाने का कुछ अंदाज लगाया है। देश के नेता जो देश के साथ कर रहे हैं तो इस पर इनके उद्‍गार होते हैं, इन नेताओं ने देश की सीटी बजा रखी है, या फिर भारतीय टीम के हारने पर, ढंग से सीटी भी नहीं बजा सकते, या फिर बरमुडा को हराने पर, भारतीय टीम ने क्या मस्त सीटी बजाई। कभी कभी कोई काम बिगड़ जाता है तो वे सीटी से किसी और वाद्य पर शिफ़्ट हो जाते हैं और कहते हैं, अरे इसमें तो रणभेरियाँ और ‍तुरहियाँ बजी हुईं हैं, या फिर कहेंगे, बुरी तरह से नगाड़े बजा रखे हैं। कोई काम बहुत अच्छा होने पर कहते हैं, बहुत ही सुर में बजाई हैंजीविका के लिए ये कलम घिसते हैं और कलम के फल अर्थात् समाचार पत्रों से ख़फ़ा नज़र आते हैं। इस आलेख में उन्होंने यही आक्रोश व्यक्त किया है।]  

बाज़ार की बयार

हर व्यक्ति का रोज़ सुबह अख़बार के पन्नों से तो पाला पड़ता ही है। वैसे आजकल पाला तो दिसंबर जनवरी में भी नहीं पड़ता, हाँ गर्मी ज़रूर सुरसा की तरह मुँह फैला रही है। ख़ैर बात समाचारों की कर रहा था। आज सुबह के अख़बार ही शेयरों के औधें मुँह गिरने की मुख्य ख़बर थी। एक नज़र दूसरे पन्नों की ख़बरों पर भी। सिनेमा के विज्ञापन वाले पृष्‍ठ पर मल्लिका शेरावत अपने आधे उरोज़ और अधोवस्त्र की प्रदर्शनी लगाकर अपनी आपको फिल्म देखने के लिए खुला आमंत्रण दे रही हैं कि दम है तो देखो नहीं तो…. पेज ३ पर अधेड़ और जवाँ प्रतिष्ठित हस्तियों (?) के मदहोश, अधनंगे चित्रों की बाढ़-सी लगी हुई है। एक और ख़बर है कि अमेरिका में डेटिंग कि जगह हुक अपने ले ली है। हुक अप एक नया चलन है जो आधुनिक बाज़ार के हिसाब से डिस्पोज़ल जैसा है। यानी यूज़ एंड थ्रो। इसने युवाओं के बीच एक नई कहावत का जन्म दिया है कि मांस खाओं हड्डी गले मत बाँधो। एक जगह वैद्यराज की सलाह वाले कॉलम में नीक हकीम ख़तराए जान की तर्ज पर वैद्यराज जी एक जवान पाठिका की व्यक्तिगत परेशानी का समाधान दे रहे हैं जो कि अपने प्रेमी के शीघ्र पतनसे व्यथित है। वह अपने आपको पतितनहीं मानती और प्रश्न उसके द्वारा पूछे जाने का कारण भी बताती है कि उसके प्रेमी को यह सब पूछने में शर्म आती है। वर्गीकृत विज्ञापन पर नज़र डालें तो हेल्थ वर्ग में अनोखे मसाज़ पार्लर के इश्तहार में मसाज़ से अधिक वर्णन मसाज़ करने वाली/वाले लोगों का ज़िक्र ज़्यादा रहता है। एसे विज्ञापन अख़बारों के पूरे माह या साल भर के विज्ञापन छूट का लाभ अवश्य लेते हैं। आवश्यकता है के कॉलम में सिर्फ़ स्मार्ट लड़के लड़कियाँ ही चाहिए होती हैं। विज्ञापन पढ़कर ऐसा लगता है जैसे उन्हें काम नहीं करना पड़ेगा बल्कि किसी फैशन शो में हिस्सा लेने के लिए आमं‍त्रित किया जा रहा है। एक सर्वे की रिपोर्ट छपती है कि संसार में समलैंगिक पुरुषों की संख्या सामान्य पुरुषों कि तुलना में कहीं ज़्यादा हो गई है। फिल्मी कॉलम में एक हिरोइन का बयान छपता है कि फिल्म इंडस्ट्री में कोई ऐसी लड़की नहीं है जो डायरेक्टर का बिस्तर गरम नहीं करती। कुल मिलाकर समाचार पत्र भी कुछ चैनलों की तरह (बेचारे दूरदर्शन को छोड़कर) अपसंस्कृति ही परोस रहे हैं, हालाँकि इसमें भी अब संक्रमण होने लगा है। आजकल हर बड़े अख़बार ने सिटी के पन्ने के नाम से सीटी बजाना शुरू किया है जिसमें समझने लायक कुछ नहीं लिखा होता सिवाय प्रायोजित फ़ोटो और बेहूदा कार्यक्रमों के। इसी तरह हर गली मुहल्ले के केबल वाले भी रात को कुछ निश्चित कार्यक्रम दिखाते हैं जिनके दर्शक सुबह उठकर सबसे पहला काम सभ्यता को रौंदने का ही करते हैं। ज़्यादातर लड़कियाँ रोड पर चलते हुए अपनी देह की परीक्षा देती हुई नज़र आती हैं। अगर किसी मनचले ने उनको छेड़ दिया या उनका मोबाइल नंबर माँग लिया तो समझो वे अपनी देह परीक्षा में पास हो गईं और कल से रिज़ल्ट हाथ में आने का इंतज़ार करती नज़र आती हैं। स्कूल-कॉलेज और गलियारे से निकलकर यह जवान कुसंस्कृति बाग़-बग़ीचों में भी कुछ-कुछ करते हुए दिख जाती है। बेचारे बुजुर्गों को वहाँ भी चैन नही।

बदलाव प्रकृति का नियम है। संस्कृति और सभ्यता भी बदलती है, लेकिन उसके मूल्यों में बदलाव आने का मतलब है कि वह राष्‍ट्र और समाज नष्ट होने की कगार पर है। वक्त की बयार की गति के साथ ही हमारी संस्कृति की रेत उड़कर कहीं और नया आकर लेती है। मुझे एक वाकया याद है कि एक साक्षात्कार में भूटान नरेश ने कहा था कि कैसे सैटेलाइट चैनलों के प्रसारण पर बाँध लगाकर उन्होंने अपने छोटे से देश की संस्कृति को बचाकर रखा। हमारे देश में प्रगति के मापदंड पर सेंसरशिप को अभिशाप माना जाता है, अनुपम खेर को केंद्रीय फिल्म प्रमाणन बोर्ड से इसलिए बाहर कर दिया गया क्योंकि उनके समय में सबसे अधिक फिल्में जारी हुईं।

मुझे यह बात बहुत बुरी लगती है कि अपने राष्‍ट्र की संप्रभुता पर गर्व करने वाले हम भारतीय अपनी सांस्कृतिक संप्रभुता कि ज़रा-सी भर भी फ़िक्र नहीं करते। उसका कारण यही हो सकता है हमारे देश में फ्रांस की तर्ज पर कभी कोई सांस्कृतिक आंदोलन नहीं हुआ। यहाँ भी नवजागरण लाने की ज़रूरत है। जब अपनी सांस्कृतिक संप्रभुता को बचाने के लिए भूटान जैसा छोटा देश (भौगोलिक दृष्‍टि से छोटा लेकिन इस मामले में हमारे देश से बड़ा) कोई निर्णय लेने में नहीं झिझकता तो आखिर हम ऐसा किस लाभ के लिए कर रहे हैं। हमने मुक्त बाजार और वैश्विक अर्थव्यवस्था के नाम पर अपनी सांस्कृति धरोहरों को विदेशियों के हाथ गिरवी रख दिया। यह सब भारतीय संस्कृति पर डाला जाने वाला मीठा जहर है जिसे हम रोज़ अपने आस-पास देखते हैं, लेकिन पता नहीं क्यों कुछ बोलते नहीं। एक कहावत है कि जिस घर में लड़कियाँ नहीं होतीं उस घर में देहली तो है। मतलब यह कि आज आप के बच्चे इस अपसंस्कृति का शिकार भले नहीं बन रहे हों लेकिन आगे आने वाला कल भी तो आपके साथ है।

 लेखक: सीटीवादक

क्रिकेट ही नहीं अन्य बातों में भी बांग्लादेश भारत से आगे है

बांग्लादेश ने भारत को क्रिकेट में तो धूल चटा ही दी परंतु वह चरमपंथियों के विरुद्ध भी हमसे आगे है। बांग्लादेश में ‍बम विस्फोट करने वाले प्रतिबंधि इस्लामी संगठनों के अतिवादियों को मौत की सजा दे दी गई। यह कार्य निर्धारित समय से भी पहले बिना किसी चेतावनी के कर दिया गया क्योंकि सरकार को इनके समथर्कों द्वारा बदला लेने का आशंका थी। इन संगठनों ने बम विस्फोट की जिम्मेदारी लेकर कहा था कि वे बांग्लादेश में इस्लामी क़ानून लागू करने की लड़ाई लड़ रहे हैं। जरा ये ख़बर देखें।
बांग्लादेश भी चरमपंथियों का धर्म नहीं देखता है परंतु आज हमारे देश में कोई अफजल गुरु के बारे में बात करने वाला ही नहीं रहा। मीडिया और देश मिलकर क्रिकेट का स्यापा कर रहे हैं। जिसने देश की सर्वोच्च संस्था संसद पर हमला किया उसे बचाने के लिए हमारे ही नेता लगे हुए थे। उन्हें अपने वोट हाथों से खिसकते नज़र आ रहे थे। वे जानते थे कि भारत की जनता थोड़े ही दिनों मे सब कुछ भूल जाएगी और ऐसा हो भी गया है। देश के ‍मुस्लिमों के भड़क जाने का भय दिखाया गया था। सांप्रदायिक दंगों का भय दिखाया गया था। मानव अधिकार वाले भी छाती कूट रहे थे। इन्हें केवल आतंक फैलाने वाले ही मानव दिखाई देते हैं, जो विस्फोट में मारे गए या जो सुरक्षाकर्मी मारे गए वो तो रोबोट थे। देश की आम जनता का क्या जीना और क्या मरना। ‍जिन्दा भी है तो कीड़ों की जिन्दगी लिए रोज तिल तिल मरते हैं। आतंकवादी तो तारणहार हैं जिन्होंने आमजन को ऐसी जिन्दगी से मुक्ति दी है। भला उन्हें क्यों फाँसी दी जाए। उन्हें तो मुक्तिदाता के रूप में नियुक्त किया जाना चाहिए।
मीडिया भी इस बारे न कुछ छापता है और न कुछ दिखाता है। क्योंकि यहाँ से शायद कुछ नही मिलना है। पिछले दिनों कुछ चिट्ठों में भी तर्क दिए गए कि मुंबई में हुए दंगों का बदला लेने के लिए क्रमबद्ध विस्फोट किए। ऐसा सोचते तो कश्मीर के सारे पंडित आतिशबाज़ी कर रहे होते। वे लोग अपने जमीन से धर्म के नाम पर बेदखल हो गए, परंतु हथियार उठा कर ‍निर्दोषों से बदला नहीं लिया। हम मिलजुल कर रहते आए हैं और आगे भी रहेंगे। एक घर में भाइयों में अनबन हो जाती है परंतु एक दूसरे के बिना उनका अस्तित्व नहीं है। कुछ बुद्धिजीवियों को इन बातों से हिन्दुत्व की बू आ सकती है। तो हे ज्ञानियों, ज्ञान का चश्मा हटा कर इन बातों को धर्म से निरपेक्ष होकर तथा देश के सापेक्ष होकर देखना तभी सच्चे धर्मनिरपेक्ष कहलाओगे।

क्या नारद के प्रबंधकगण बता सकते हैं?

नारद के प्रबंधकगण, जो भी हैं, यह बताएँ कि क्या नारद पर प्रतिवर्ष जनवरी में अपने ब्लॉग का पंजीकरण कराना होता है. ऐसा इसलिए लिख रहा हूँ कि दिसंबर 2006 के बाद जनवरी 2007 से मेरी पोस्ट्स नारद पर नहीं आती थीं। फ़रवरी और मार्च मेरी यह, यह, यह और यह पोस्ट नारद पर नहीं दिखाई दी अर्थात् नारद पर मेरा चिट्ठा अपडेट नहीं हुआ। मैंने सोचा कि जब सब के चिट्ठे नारद पर आ रहे हैं तो फिर वर्डप्रेस डॉट कॉम पर गड़बड़ होगी परंतु वहाँ पर पोस्ट्स दिखाई देती थीं। इसके लिए मैंने परिचर्चा ब्लॉग/वेबसाइट संबंधी सहायता में एक में थ्रेड खोला क्योंकि नारद पर संपर्क का कोई विकल्प नज़र नहीं आया। इस थ्रेड को परिचर्चा के माध्यम से जीतू भाई और मिर्ची सेठ को संदेश भी भेजे। पर कोई जवाब नहीं मिला। बहुत दिनों से घुघूती बासूतीजी के प्रश्नों के उत्तर की पोस्ट वर्डप्रेस डॉट कॉम पर ड्राफ़्ट के रूप में रखी थी। आखिरकार कल मैंने सोचा ‍कि क्यों न नारद पर एक बार फिर पंजीकरण की प्रक्रिया दोहरा कर देखी जाए। मैंने फिर से अपने चिट्ठे का पंजीकरण नारद पर किया और प्रश्नोत्तर वाली पोस्ट को पोस्ट किया। चमत्कार! मेरा चिट्ठा नारद पर नज़र आ रहा था। इस चमत्कार का चक्कर क्या है कोई बता सकता है? या यह कोई तकनीकी त्रुटि थी?

घुघूती बासूतीजी के प्रश्नों के उत्तर

आज वर्ष प्रतिपदा है, सभी को नववर्ष की शुभकामनाएँ।
पिछले कई दिनों से चिट्ठा जगत में टैगिंग का कार्यक्रम चल रहा था और हम तो इस मामले में निश्चिंत थे कि हमें कोई टैग करने वाला नहीं है। हमें लग रहा था कि यह पहुँचे हुए चिट्ठाकारों के लिए ही बेहतर है कि वे उनकी चिट्ठाकारी के अनुभव लोगों के साथ बाँटें और स्वयं के बारे में बताएँ। अपने पास चंद पोस्ट्स के अलावा कोई अनुभव नहीं हैं जो लोगों के समक्ष प्रस्तुत किया जाए। हम इस खेल को चुपचाप देखते रहे। धीरे धीरे सभी के उत्तर सामने आते जा रहे थे। नींव के पत्थरों को जानने समझने के अवसर मिल रहे थे। इस प्रश्नोत्तरी के चलते जब घुघूती बासूतीजी के पास प्रश्न पहुँचे तो उन्होंने पाँच में से एक हमें भी टैग कर लिया। घुघूती बासूतीजी अध्यापिका हैं इसलिए कम नंबर आने पर सजा भी मिल सकती है, जैसे फलाँ पोस्ट या टिप्पणी को दस बार लिखना। खैर सजा और पास-फेल का भय त्याग कर हम प्रश्नों के उत्तर तो दिए देते हैं। उत्तर देने में बहुत देर हो गई है अब तक टैगिंग का सारा ज्वार उतर गया है।
 प्रश्न क्र. 1  : एक अच्छी पुस्तक और एक अच्छे टीवी कार्यक्रम में से आप क्या चुनेंगे?
 उत्तर :       यदि पुस्तक और टीवी कार्यक्रम के बारे में पूछा जाता तो निश्चित रूप से पुस्तक को ही प्राथमिकता देता परंतु पुस्तक और टीवी कार्यक्रम दोनों के ही आगे अच्छा लिखा है इसलिए यदि टीवी कार्यक्रम अच्छा है तो मैं टीवी कार्यक्रम पहले देखना पसंद करूँगा क्योंकि हर टीवी कार्यक्रम दोबारा प्रसारित नहीं होते। पुस्तक अपने ही पास है इसलिए बाद में पढ़ी जा सकती है।
 प्रश्न क्र. 2  : यदि एक सप्ताह तक आपको कंप्यूटर से दूर रहना पड़े तो आपको कैसा लगेगा?
 उत्तर :      यहाँ कंप्यूटर का तात्पर्य शायद इंटरनेट से होना चाहिए। वाकई बहुत बुरा लगेगा। नेट से दूर रह कर ऐसा लगता है जैसे दुनिया कट गए हों। जब भी समय मिलता है नेट पर सीधे नारद या परिचर्चा पर पहुँचता हूँ। क्योंकि चिट्ठा जगत की हलचल जाने बिना मन को चैन नहीं।
 प्रश्न क्र. 3 : यदि आपकी सलाह से भगवान काम करने लगें तो आप उसे पहली सलाह क्या और क्यों देंगे?
उत्तर :   कई ऐसी राष्ट्रीय-अंतर्राष्टरीय समस्याएँ हैं जिनके लिए सलाह दी जा सकती है जैसे आतंकवाद, अशिक्षा, गरीबी, धर्मांधता, नस्लवाद बेरोजगारी तथा और भी कई, परंतु एक ही सलाह देना है इसलिए मैं सलाह दूँगा कि सभी लोग पृथ्वी के पर्यावरण की सुरक्षा को तत्पर हो जाएँ। यदि ये धरती ही नहीं रही तो क्या धर्म, क्या देश, क्या नस्ल और क्या संप्रदाय। सब बेमानी है। मनुष्य द्वारा प्राकृतिक संसाधनों के अत्यधिक दोहन से पारिस्थितिकीय संतुलन बिगड़ गया है। अनेक प्राणी और वनस्पतियाँ विलुप्त हो गई हैं या विलुप्ति की कगार पर हैं। हवा में इतना जहर है कि सांस लेना मुश्किल है। खेतों में इतना जहर डाला कि पैदा होने वाले अनाज में उसका असर है। इन्हीं अनाजों, फल, सब्जियों के सेवन से मनुष्य की धमनियों में रक्त के साथ साथ कीटनाशक भी दौड़ता है। गंगा हालत ऐसी कर दी है कि उसका जल पीना बीमारियों को आमंत्रण देना है। विकास के नाम पर या निजी स्वार्थ के लिए पेड़ों पर बेरहमी से कुल्हाड़ी चला दी जाती है। चिपको आंदोलन वाले सुंदरलाल बहुगुणा अब अप्रासंगिक हो गए हैं। वन क्षेत्र नष्ट होने से मौसम चक्र गड़बड़ा गया है। कभी अल्प वृष्टि तो कभी अति वृष्टि। धरती गरम हो रही है और ध्रुवों की बर्फ पिघल रही है। बहुत जल्दी तटीय इलाके जलमग्न हो जाएँगे। गंगा के डेल्टा पर स्थित सुंदरवन का क्षेत्रफल कम होता जा रहा है। सोचिए जरा! हम अपनी आने वाली पीढ़ी के लिए क्या छोड़ कर जाएँगे। ऐसी धरती जहाँ पीने का पानी भी पर्याप्त न मिले तो क्या नई पीढ़ी हमें नहीं कोसेगी। इसलिए मैं भगवान को सलाह दूँगा कि सभी का मस्तिष्क ऐसा कर दे कि वह प्रकृति को नष्ट न करें। यदि पृथ्वी बची रही तो मानव इतना परिपक्व तो हो ही गया है कि शेष रहे अन्य मसले जैसे भाषा, प्रांतीयता, क्षेत्रवाद, धार्मिक कट्टरता, भ्रष्टाचार आदि मिल कर हल कर सकें।
 प्रश्न क्र. 4 यदि आपको किसी पत्रिका संपादक बना दिया जाए तो आप किन चिट्ठाकारों की रचनाएँ अपनी पत्रिका में प्रकाशित करेंगे?
 उत्तर :     इसका उत्तर देने पर निश्चित रूप से पिटाई होगी यदि वे चिट्ठाकार मुझ तक पहुँच जाएँ जिनके नाम मैं यहाँ न लिखूँ। इस प्रश्न का उत्तर देना मेरे लिए बहुत क‍‍ठिन है क्योंकि चिट्ठा जगत में विभिन्न विषयों के ज्ञाता हैं जो अपने विषय के अलावा अन्य विषयों पर भी बहुत अच्छा लिखते हैं। मैं इस लायक नहीं हूँ इन अग्रजों में से किसी का चयन करूँ।
 प्रश्न क्र. 5 यदि आपको जीवन का कोई एक दिन फिर से जीने को मिले तो वह कौन सा दिन होगा?
 उत्तर  :    जीवन की अच्छी बुरी कई घटनाएँ, कई दिन ऐसे हैं जिन्हें मैं फिर से जीना चाहूँगा। बहुत से सुखद क्षण हैं जिनके लिए सोचा जा सकता है कि वे लौट आएँ। सोने से मन वाला निर्मल निश्चिंत बचपन भी याद आता है, जब बच्चे की सारी फिक्र माता पिता करते हैं। या फिर कॉलेज के सुनहरे सपनीले दिन, ऐसा लगता था जैसे पंछी बन कर आकाश में उड़े चले जा रहे हैं, परंतु समय ही पंछी की तरह उड़ जाता है, ये कुछ साल तो क्षणिक स्वप्न से बीत गए।

नहीं ये सब नहीं, मैं 1998 की देवप्रबोधिनी एकादशी या देवउठनी एकादशी (हिन्दू पंचांग के अनुसार दीपावली के बाद ग्यारहवीं तिथि) का दिन किसी भी कीमत पर फिर से जीना चाहूँगा। उस दिन सुबह लगभग 5 बजे माँ ने आवाज़ देकर बुलाया, उस समय भाई दूज के लिए मेरी बड़‍ी बहन भी आई हूई थीं, हम दोनों भाई बहन नींद में चौंक कर माँ के पास पहुँचें तो देखा माँ उठ कर बैठी हुई हैं, उन्होंने बताया कि उनकी जबान अंदर की ओर खिंचती महसूस हो रही है। हमें उनकी बात बिलकुल साफ सुनाई दे रही थी इसलिए हमने माँ को समझाया कि ऐसा कुछ नहीं है, क्योंकि कुछ दिनों पहले उनके दाँतों में कुछ परेशानी हुई थी भोजन निगलने में भी समस्या हो गई थीश डॉक्टर ने बायोप्सी करने को कहा तो माँ ने लक्षणों के आधार पर सोच लिया था कि उन्हें कहीं गले का कैंसर न हो जाए और ऐसा कुछ हुआ नहीं था। अत: इस बार हमने सोचा कि कुछ नहीं होगा। उन्होंने हमारी बात मान भी ली। इस बार उनका इशारा था कि उन्हें पक्षाघात हो गया है या होने वाला है, यह सोच कर ही हम भाई-बहन भयभीत हो गए थे। इसके बाद माँ ने स्नान किया पूजन किया अपना फलाहार बनाया, ग्रहण किया। माँ को काम करते देख कर हम सोच रहे थे कि वे ठीक हैं। चूँकि उन्हें उच्च रक्तचाप और मधुमेह की शिकायत थी ‍इसलिए भी उन्हें कभी कभी चक्कर आ जाया करते थे इसलिए इस बार भी ऐसा ही मान लिया गया। दिन ढलने पर माँ को कमजोरी लगने लगी और शाम के समय मैं डॉक्टर को लेकर आया। डॉक्टर ने जाँच करके तुरंत भर्ती करने के लिए कह दिया। अब मेरे और दीदी के मन में घबराहट हुई। हम लोग माँ को लेकर हॉस्पिटल पहुँचे, वहाँ जाकर डॉक्टर ने बताया कि यह पैरेलिसिस का अटैक है, यदि इन्हें पहले चिकित्सा मिल जाती तो पूर्ण स्वस्थ हो सकतीं थीं अब कुछ कहा नहीं जा सकता। यह सुन कर मुझे और दीदी को काटो तो ख़ून नहीं। हमने स्वयं उन्हें इस ओर धकेला था। रात तक माँ कुछ भी बोल पाने में अक्षम हो गईं थीं। उन्हें 15 दिन तक हॉस्पिटल में रखा गया। बोली बंद हो जाने के कारण वे उनकी आवश्यकताएँ बताने में असमर्थ हो गईं थीं और हम भी उनके इशारे बड़ी कठिनाई से समझ पाते थे।

तीसरे दिन ही रात को 12 बजे के लगभग माँ ने अपने मुँह की ओर इशारा किया और कुछ बोलने का प्रयास किया। हमने यह अंदाज लगाया कि वे बता रही हैं कि वे बोल नहीं पा रही हैं और इससे उन्हें बैचेनी है। मैंने और दीदी ने ‍उन्हें दिलासा दिया कि जल्द ही वे बोल पाएँगी। इस पर उन्होंने मुँह की ओर फिर इशारा किया, बार बारा इशारा किया, हम बार बार उन्हें समझाते रहे। अब तो उन्होंने रोना शुरु कर दिया। हमने फिर समझाया कि उनके रोने से आस पास के कमरे के मरीजों को परेशानी होगी, उन्हें क़ाग़ज़ पेन दिया कि वे लिख कर समझा दें, पर लिखें कैसे दायाँ हाथ भी तो लकवे का शिकार था। खैर वे रो रोकर सो गईं। सुबह छ: बजे उनकी नींद खुली उस समय मेरे हाथ में पानी का गिलास था उसे देख कर उसकी इशारा किया। हमने उन्हें पानी दिया और अंदाजा लगाया कि रात को शायद माँ ने पानी ही माँगा होगा। फिर अपने आप को कोसा कि क्यों पानी का नहीं पूछा। माँ की पूरी तरह नहीं लौटी परंतु वे 20 से 30 दिन में तीन-चार साल के बच्चे की तरह तुतला कर बोलने लगीं। हमारे लिए यही बहुत था। लगभग दो माह में वे किसी के सहारे घर में चलने लगीं थी परंतु स्वयं कुछ भी करने मे सक्षम नहीं थीं और पूरी तरह दूसरों पर निर्भर हो गईं थी। उनका जीवन उनके पलंग और कमरे तक ही सीमित हो गया था। कई दुखी होकर वे तोतली भाषा में कहतीं थीं कि मैंने और दीदी ने उस दिन उन पर ध्यान नहीं दिया तो ये दिन देखना पड़ा। माँ ने इसी स्थिति में ढाई साल गुजारे और सन् 2001 में वर्ष प्रतिपदा (पुड़ी पड़वा) अर्थात हिन्दी नव वर्ष को परलोक सिधार गईं। आज मैं सोचता हूँ कि उस दिन यदि माँ की बात को गंभीरता से लिया होता तो आज शायद वे हमारे बीच होतीं।
इसीलिए मैं वर्ष 1998 की देवउठनी एकादशी का दिन फिर से जीना चाहूँगा ताकि मैं अपने इस घोर अपराध या पाप को सुधार सकूँ।

अपनी निजी बातें कुछ ज्यादा ही लिख गया, परंतु घुघूतीजी ने प्रश्न ही ऐसा कर लिया था कि भावनाएँ उमड़ पड़ीं। आशा है वे मुझे पास कर देंगी।

अब मैं किसे टैग करूँ? मैं किसी को टैग नहीं करना चाहता फिर भी मैं रवि रतलामीजी और सृजन शिल्पीजी से कुछ जानना चाहता हूँ।
रवि भैया आपके चिट्ठे से मैंने जितना आपके बारे में जाना है उससे पता चलता है कि आप मध्य प्रदेश राज्य विद्युत मंडल में इंजीनियर थे। मैं अदाज लगाता हूँ कि संभवत: आप इलेक्ट्रिकल के क्षेत्र से रहे होंगे। यदि किसी प्रकार की व्यावसायिक अड़चनें न हो तो मेरी जिज्ञासा यह है कि आप कंप्यूटर, सॉफ्टवेयर, इंटरनेट की ओर कैसे आए और आपने कैसे जाना कि हिन्दी में भी काम किया जा सकता है? चिट्ठा जगत से आपका परिचय और प्रवेश की कहानी भी जानना चाहता हूँ? 

   
इसके बाद सृजन शिल्पीजी – वे पत्रकारिता से जुड़े व्यक्ति हैं और उनकी पोस्ट उनके विशद् अध्ययन की व्याख्या करतीं हैं। मैं उनसे जानना चाहता हूँ कि आने वाले समय में संचार माध्यमों की तुलना में हिन्दी चिट्ठों का जनता पर क्या प्रभाव होगा? साथ ही यह भी कि उनके द्वारा लिखी जा रही नेताजी से संबंधित सभी पोस्ट्स क्या कभी पुस्तकाकार लेकर उन लोगों तक पहुँचेगी जो आने वाले समय में भी शायद इंटरनेट का प्रयोग न कर पाएँ.

केवल एक दिन महिलाओं के लिए?

Indian Woman

8 मई महिला दिवस है। विकसित कहे जाने वाले देश और समाज जैसे इंग्लैंड या अमेरिका में भी महिलाओं के साथ हिंसक घटनाएँ उनके पति या परिवार वालों के द्वारा ही होती रहतीं हैं। भारत में ‍इसकी जितनी ख़बरें छपतीं या प्रसारित होतीं हैं उससे कहीं अधिक नेपथ्य में रह जातीं हैं। पुराने जमाने में महिलाओं को उसके मृत पति के साथ जिंदा जला दिया जाता था (छुटपुट घटनाएँ आज भी हो जातीं है) तो आज लड़की को मार कर तंदूर में जला दिया जाता है और उसके अपराधी को सजा तक नहीं होती (अभी अभी हुई है)। बार में लड़की ने शराब देने से इंकार कर दिया तो गोली मार दी। तेरह वर्षीय अमीना को सत्तर साल के शेख के साथ बाँध दिया। कुछ सौ रुपयों में कमला को खरीदा जा सकता है। नशे की झोंक में तलाक दे दिया। पति लापता हो गया तो गुड़िया की शादी किसी और से कर दी (उससे पूछा भी नहीं होगा), जब पहला पति लौट आया तो समाज के ठेकेदार तय करने लगे कि अब गुड़िया किसके साथ रहेगी। गुड़िया क्यों नहीं फैसला कर सकती कि उसे किसके साथ रहना है। गुड़िया सवाल क्यों नहीं कर सकती कि उसकी शादी किसी से भी क्यों की जा रही है। ससुर ने बहू के साथ बलात्कार किया तो फतवा जारी हो गया कि महिला अब उसके पति के लिए हराम है। इन घटनाओं पर मीडिया ने मेहबानी दिखाई (अपनी टीआरपी बढ़ाने के लिए) और ये सामने आईं। देवदासी प्रथा बहुत कम हो गई है परंतु पूरी समाप्त नहीं हुई है। कुछ विशेष समाजों में परिवार की बड़ी लड़की को वेश्यावृत्ति करनी होती है और यह उनके समाज में मान्य भी है। कुछ समाजों में स्त्री को स्वयं को सच्चरित्र सिद्ध करने के लिए अग्नि परीक्षा देनी होती है। इसके लिए उबलते तेल में हाथ डालना होता है या हथेली पर पान का पत्ता रख कर उस पर लाल तपी हुई लोहे की सलाख रखनी होती है, यदि इस प्रक्रिया में स्त्री को कोई नुकसान नहीं होता तो उसे पवित्र मान लिया जाता है। अब कल्पना करें क्या ऐसा होता होगा? यह तो उनके जीवन में होने वाली घटनाएँ हैं, कई लोग तो लड़कियों को जन्म लेने से पहले ही मार देते हैं। क़ानून होने के बाद भी कई चिकित्सक भ्रूण लिंग परीक्षण करते हैं और घोषित करने की मोटी रकम लेते हैं। विषय और घटनाक्रम अनेक हैं जो लिखे जा सकते हैं।
हर साल की तरह इस बार भी समारोह होंगें, घोषणाएँ होंगीं, परिचर्चाएँ होंगीं और भाग लेने वाली महिलाएँ (पुरुष भी हो सकते हैं) होंगीं कोई नेता, फ़िल्म स्टार, किसी बड़े उद्योगपति या अधिकारी की पत्नी। लगभग इन सभी महिलाओं ने बचपन से लेकर वर्तमान समय तक शायद ही कभी ग्रामीण या निम्न वर्ग (आर्थिक रूप से, यहाँ जाति या समाज का संदर्भ न लें) की महिलाओं के जीवन को निकट से देखा होगा। गाँवों में स्त्रियाँ सुबह अँधेरे से उठ कर घर के सारे काम करके खेतों में भी पति के साथ मेहनत करती हैं और शाम को घर आकर फिर भोजन आदि घर के कार्यों में जुट जाती है। क्या केवल गाँवों में ही ऐसी स्थिति है, बिलकुल नहीं यह स्थिति किसी शहरी नौकरीपेशा मध्यमवर्गीय परिवार में भी मिल सकती है और श्रमिक वर्ग में भी। घरेलू हिंसा पर क़ानून बन गया पर भारतीय समाज का ताना बाना कुछ ऐसा है कि शायद कुछ ही महिलाएँ परिवार के सदस्यों के विरुद्ध क़ानून की मदद ले। भारत की वह तस्वीर बहुत भली मालूम होती है जिसमें कोई महिला वकील है, कोई डॉक्टर है, कोई पायलट है, कोई सेना में है, पुलिस में है, सॉफ़्टवेयर इंजीनियर है, ये है, वो है, सब कुछ है, हर क्षे‍त्र में है। परंतु इसका अनुपात उतना ही है जैसे किसी समुद्र में तैरते हिमखंड का पानी के ऊपर का भाग। उसका जो नब्बे प्रतिशत भाग पानी में रहता और नज़र नहीं आता, कमोबेश वही स्थिति इस चमकीले परिदृश्य से परे महिलाओं की है। अधिसंख्य लड़कियाँ विद्यालय का मुँह भी नहीं देख पाती। बहुतों को प्राथमिक और माध्यमिक के बाद विद्यालय छोड़ना पड़ता है, इनमें से अधिकांश का विवाह हो जाता है। इस समय इनकी उम्र अठाहर वर्ष से कम ही होती है। अधिकतर परिवारों में माता-पिता मजदूरी पर जाते हैं तो बड़ी लड़की को अपने छोटे भाई बहन को संभालने के लिए घर रहना होता है। ऐसे में स्कूल जाने का सवाल ही नहीं उठता। यदि लड़की भाई बहनों सबसे छोटी है तो शायद दो-चार साल विद्यालय जाए परंतु कुछ बड़ी होने पर वहाँ से निकाल लिया जाता है ताकि वह भी कुछ काम करे और घर की आय बढ़े। इतने बड़े परिवार के लिए सभी का काम करना भी जरूरी है क्योंकि माता-पिता को इतनी मजदूरी नहीं मिलती वे अपना परिवार चला सकें। इन बच्चियों का बचपन में ही विवाह हो जाता है और फिर वही चक्र शुरु हो जाता जिससे उनकी माँ गुजरी है। देश के हर भाग में लगभग हर समाज में ये समस्याएँ है जो आज भी मौजूद हैं हालाँकि इनमें कमी जरूर आई है। अनेक संस्थाएँ इस दिशा में काम कर रहीं हैं। महिलाओं का साक्षरता प्रतिशत पहले से बढ़ा है। एक दिन निश्चित रूप से ऐसी घटनाएँ इतिहास की बातें होंगीं और ये पंक्तियाँ भी-

अबला जीवन हाय तेरी यही कहानी
आँचल में है दूध और आँखों में पानी।

कहानी बदल रही है, बदलेगी।